07-02-2024 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


मीठे बच्चे - आत्म-अभिमान विश्व का मालिक बनाता है, देह-अभिमान कंगाल बना देता है, इसलिए आत्म-अभिमानी भव''

प्रश्नः-
कौन-सा अभ्यास अशरीरी बनने में बहुत मदद करता है?

उत्तर:-
अपने को सदा एक्टर समझो, जैसे एक्टर पार्ट पूरा होते ही वस्त्र उतार देते हैं, ऐसे तुम बच्चों को भी यह अभ्यास करना है, कर्म पूरा होते ही पुराना वस्त्र (शरीर) छोड़ अशरीरी हो जाओ। आत्मा भाई-भाई है, यह अभ्यास करते रहो। यही पावन बनने का सहज साधन है। शरीर को देखने से क्रिमिनल ख्यालात चलते हैं इसलिए अशरीरी भव।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) दृष्टि को शुद्ध पवित्र बनाने के लिए किसी के भी नाम रूप को न देख अशरीरी बनने का अभ्यास करना है। स्वयं को आत्मा समझ, आत्मा भाई से बात करनी है।

2) सर्व का सत्कार प्राप्त करने के लिए ज्ञान-योग की ताकत धारण करनी है। दैवीगुणों से सम्पन्न बनना है। कैरेक्टर सुधारने की सेवा करनी है।

वरदान:-
बीमारी कान्सेस के बजाए खुशी-खुशी से हिसाब-किताब चुक्तू करने वाले सोलकान्सेस भव

तन तो सबके पुराने हैं ही। हर एक को कोई न कोई छोटी बड़ी बीमारी है। लेकिन तन का प्रभाव अगर मन पर आ गया तो डबल बीमार हो बीमारी कान्सेस हो जायेंगे इसलिए मन में कभी भी बीमारी का संकल्प नहीं आना चाहिए, तब कहेंगे सोल कान्सेस। बीमारी से कभी घबराओ नहीं। थोड़ा सा दवाई रूपी फ्रूट खाकर उसे विदाई दे दो। खुशी-खुशी से हिसाब-किताब चुक्तू करो।

स्लोगन:-
हर गुण, हर शक्ति का अनुभव करना अर्थात् अनुभवी मूर्त बनना।