01-11-2026     प्रात:मुरली  ओम् शान्ति 05.03.2012 "बापदादा"    मधुबन


अब चारों ओर दु:ख अशान्ति बढ़ रही है इसलिए अपने विश्व कल्याणी स्वरूप को प्रत्यक्ष करो, मन्सा सेवा बढ़ाओ, बाप के संग के रंग से डबल होली बनो


आज बापदादा हर बच्चे के भाग्य की रेखायें देख रहे हैं। मस्तक में चमकते हुए सितारे की रेखा, नयनों में स्नेह और शक्ति की रेखा, होठों में मुस्कान की रेखा, पांव में हर कदम में पदम की रेखा देख रहे हैं। आप सभी भी अपने भाग्य की रेखायें देख हर्षित होते हो ना! दिल में यही गाते वाह मेरा भाग्य! हर एक का मस्तक उस दिव्य सितारे से चमकता हुआ देख बापदादा भी खुश हो रहे हैं और यही दिल में गीत गाते वाह बच्चे वाह! बच्चों के दिल से क्या गीत सुन रहे हैं? वाह बाबा वाह! तो बच्चे भी वाह! बाप भी वाह! तो यह सारी सभा क्या हो गई? वाह! वाह! वाह! तो अपने भाग्य को देख सदा ऐसे ही हर्षित रहो जैसे अभी सब हर्षित हो रहे हैं। यह भाग्य अब संगमयुग में ही मिलता है। संगमयुग के हर घड़ी की बहुत बड़ी वैल्यु है। संगमयुग की एक घड़ी अविनाशी हो जाती है क्योंकि हर घड़ी का 21 जन्मों के साथ सम्बन्ध है। अब की एक घड़ी का सन्बन्ध 21 जन्मों के साथ है। तो चेक करो एक घड़ी अगर व्यर्थ गई तो एक जन्म की बात नहीं, 21 जन्म के सम्बन्ध की बात है इसलिए बापदादा बच्चों को समय प्रति समय अटेन्शन खिंचवा रहे हैं कि संगमयुग की एक घड़ी को भी, एक संकल्प को भी व्यर्थ नहीं गवाओ क्योंकि एक जन्म व्यर्थ नहीं गंवाया लेकिन 21 जन्म व्यर्थ गंवाया। संगमयुग का महत्व हर समय याद रखो।

बापदादा ने व्यर्थ समय और व्यर्थ संकल्प का होमवर्क सभी को दिया था। तो सभी ने होमवर्क किया? जो समझते हैं हमारा अटेन्शन रहा और बहुत करके सफलता भी प्राप्त हुई, लक्ष्य का लक्षण तक परिणाम है, वह हाथ उठाना। अच्छा। पाण्डव उठा रहे हैं? बड़ा हाथ उठाओ। अभी सभी ने काम नहीं किया है। संगमयुग के महत्व को अगर सदा बुद्धि में याद रखो कि अविनाशी बाप द्वारा यह कार्य मिला है। हर घड़ी अविनाशी बनने की है क्योंकि अविनाशी बाप ने यह वरदान दिया है। तो सहज ही हो जायेगा।

बाप ने सुनाया कि हर एक ब्राह्मण बच्चे के कदम में पदम की रेखा है। सोचो कदम में पदम की रेखा तो कितने पदमों के लिए संगमयुग पर गोल्डन चांस है। हर एक को यह अपना भाग्य स्मृति में रखना है। कई बच्चे सोचते हैं कि बापदादा क्या चाहते हैं? बापदादा यही चाहते हैं कि एक-एक बच्चा डबल राजा बन जाये। अभी स्वराज्य अधिकारी और भविष्य में विश्व राज्य अधिकारी। कोई भी बच्चा डबल राजा बनने में कम नहीं हो। तो हर एक बच्चा डबल राज्य अधिकारी हो ना! कांध हिलाओ। तो हर बच्चा डबल राज्य अधिकारी है! कांध हिलाओ। तो बाप को कितनी खुशी होती है।

बापदादा हर बच्चे का रिकार्ड रोज़ देखते हैं, तो क्या देखते हैं? हर एक अपने दिल में तो जान गये होंगे। राज्य अधिकारी बने तो हैं लेकिन अभी जो स्वराज्य अधिकारी हो, स्वराज्य अधिकारी अर्थात् मन-बुद्धि संस्कार को अपने कन्ट्रोल में चलाने वाला। जब चाहे जैसे चाहे वैसे अधिकार में रहे। जैसे यह स्थूल कर्मेन्द्रियां हाथ हैं, पांव हैं अपने कन्ट्रोल में रहते हैं ऐसे मन बुद्धि संस्कार जब चाहे जैसे चाहे रूलिंग पावर और कन्ट्रोलिंग पावर हो। अभी देखने में नम्बरवार बहुत हैं। हैं यह भी मेरे। मन मैं नहीं है, मेरा है। संस्कार मेरे हैं, बुद्धि मेरी है लेकिन कन्ट्रोलिंग पावर रूलिंग पावर नम्बरवार है। बापदादा समय की सूचना भी समय प्रति समय देते रहे हैं, उस समय के अनुसार आप लोगों का एक-एक का स्वमान है विश्व कल्याणकारी। अब समय प्रमाण हर एक बच्चे को विश्व कल्याणी स्वरूप को प्रत्यक्ष करने का समय है। चारों ओर दु:ख अशान्ति बढ़ रही है। आपके भाई, आपकी बहिनें, परिवार दु:खी हो रहे हैं तो आपको अपने परिवार पर रहम नहीं आता!

अभी बापदादा यही इशारा दे रहे हैं स्व पुरुषार्थ के साथ विश्व सेवा, जैसे वाचा की सेवा वर्तमान समय अच्छी धूमधाम से कर रहे हो। बापदादा खुश है, यह 75 वर्ष की जुबली ने सभी के मन में मैजारिटी सेवा का उमंग लाया है। बापदादा देख करके खुश है लेकिन अभी मन्सा सेवा की भी आवश्यकता है क्योंकि सभी तरफ विश्व कल्याणकारी बनना है, उसमें मन्सा वाचा और कर्मणा अर्थात् चलन और चेहरे से तीनों ही सेवा की अभी आवश्यकता है। रोज़ चेक करो तीनों सेवाओं में कितनी परसेन्ट सेवा की? वाचा में तो बापदादा ने भी सर्टीफिकेट दिया लेकिन अभी मन्सा सूक्ष्म वायब्रेशन्स द्वारा आत्माओं के दु:ख अशान्ति का सहारा बनना पड़े। क्या आपको तरस नहीं आता? बापदादा को तो बच्चों पर चाहे कैसे भी हैं लेकिन फिर भी बच्चे तो हैं ना, तरस आता है। तो अभी हर बच्चे को सिर्फ सेन्टर कल्याणी नहीं, ज़ोन कल्याणी नहीं विश्व कल्याणी बनना है। तो बापदादा अभी यही अटेन्शन दिला रहे हैं अपने भक्तों का कल्याणकारी बनो क्योंकि यह संगमयुग का बहुत बड़ा महत्व है। अभी संगमयुग में जो चाहे जितना चाहे उतना बाप से सहयोग मिल सकता है। तो सुना क्या करना है अभी? मन्सा सेवा को बढ़ाओ। अपने कार्य के प्रमाण जैसे ट्रैफिक कन्ट्रोल का टाइम फिक्स किया हुआ है ऐसे ही हर एक को मन्सा सेवा का भी टाइम फिक्स करना चाहिए। जब ज्यादा दु:ख होगा उस समय सभी का अटेन्शन उस हलचल में होगा लेकिन अभी मन्सा सेवा का समय है इसलिए हर बच्चे को अपने विश्व कल्याणी का स्वरूप इमर्ज करना है। विश्व कल्याण में स्व कल्याण स्वत: और सहज हो जायेगा क्योंकि अगर मन फ्री है तो व्यर्थ आता है लेकिन मन बिजी होगा तो व्यर्थ सहज ही समाप्त हो जायेगा। तो बापदादा जब चक्र लगाके चारों ओर देश विदेश के अज्ञानी बच्चों को देखते हैं तो तरस आता है इसलिए आप सब भी अब दु:ख हर्ता सुख कर्ता बनो।

तो देखो दुनिया वालों की होली और आपकी होली में कितना अन्तर है। बापदादा ने पहले भी कहा है कि आपके भक्त आप लोगों के किये हुए कार्य को कॉपी करने में होशियार हैं क्योंकि यह सब विधियां द्वापर में आने वाली आत्माओं ने बनाई हैं। तो पहला पहला जन्म था ना इसलिए उन्हों की बुद्धि भी जैसे नियम है पहले सतोप्रधान फिर रजो तमो में आते हैं, तो उस समय उन्हों की बुद्धि अपने हिसाब से सतो थी इसलिए आपकी एक-एक विशेषता को, आप सदा उत्साह में खुशी में रहते हो उसको उत्सव के रूप में मनाना शुरू किया है। जैसे शिवरात्रि पर भी बताया ना कॉपी करने में कितने होशियार हैं। ऐसे अभी भी आप सदा संगम पर उत्साह में रहते हो, तो आपका उत्साह उन्होंने उत्सव के रूप में यादगार बनाया है। तो होली में क्या करते हैं? आपने भी अपने जीवन को रंगा है लेकिन आपका रंग कौन सा है? आप सभी का रंग है बाप के संग का रंग। तो सारा समय बाप के संग के रंग में रहते हो ना! तो उन्होंने भी रंग तो बनाया लेकिन बॉडी कान्सेस है ना! तो स्थूल रंग बना दिया है। लेकिन आप सभी सदा यह कल्याणकारी संगम में इस रंग में, संग के रंग में रहते हो ना! रंग लगाया है ना! संग का रंग लग गया और होली इंगलिश में पवित्रता को कहा जाता है। तो संग के रंग में आप होली अर्थात् पवित्र बनते हो। पवित्र बने हैं ना! पवित्रता का व्रत सभी ने लिया है ना पक्का! नम्बरवार भले हैं लेकिन ब्राह्मण बनना अर्थात् पवित्रता का व्रत लेना क्योंकि बाप सदा पवित्र है। है ही पवित्र स्वरूप। बनना नहीं पड़ता। स्वरूप ही पवित्रता है। तो होली की विशेषता जानते हो क्या है? पवित्र तो आप बनते हो लेकिन आप संग के रंग में डबल पवित्र बनते हो। पवित्र धर्म पितायें, महान आत्मायें बनते हैं लेकिन वह सिर्फ आत्मा को पवित्र बनाते हैं। शरीर और आत्मा दोनों ही पवित्र वह आप भविष्य में बनते हो। शुरू से लेके देखो द्वापर से जो भी आये हैं, पवित्र बने हैं लेकिन डबल पवित्र कोई नहीं बना है। शरीर भी पवित्र आत्मा भी पवित्र। आप जब भविष्य में राज्य अधिकारी बनेंगे तो आत्मा और शरीर दोनों पवित्र होंगे। सारा चक्र घूमो। द्वापर से आये हैं, द्वापर से अब तक देखो, कोई डबल पवित्र बना है! तो क्यों आप डबल पवित्र, इतने महान बने हैं? क्योंकि आपको रंग कौनसा लगा है? परमात्मा के संग का रंग लगा है। तो जैसे परम आत्मा पवित्र है तो आप भी 21 जन्म डबल पवित्र रहते हो। चाहे धर्मपिता आये लेकिन वह भी डबल पवित्र नहीं। आपका भाग्य है क्योंकि आप रहते ही परमात्मा के संग में हो। संग का रंग इतना पक्का रहता है जो डबल पवित्र बन जाते हो। और होली का दूसरा अर्थ है हो ली। हो गया, जो बीता सो बीता। हो ली। तो हो ली करना आता है? जो हो चुका वह हो चुका। हो ली शब्द का अर्थ क्या निकलता? बीती सो बीती। इससे आप डबल होली 21 जन्म रहते हो। एक जन्म नहीं क्योंकि संगम के एक एक सेकण्ड का कनेक्शन 21 जन्मों का है। यहाँ आपने अगर एक सेकण्ड या एक मिनट सफल किया तो 21 जन्म आपका सफल रहेगा, गैरन्टी है। तो ऐसी होली मनाई है? होली करना आता है? जो बीता वह बीत गया, हो ली। और तीसरी रूप रेखा क्या करते हैं? पहले जलाते हैं फिर मनाते हैं। तो आपने क्या किया? योग अग्नि से अपनी कमजोरियों को, संस्कारों को जो अनेक जन्मों के उल्टे संस्कार हैं उसको योग अग्नि से जलाया है ना! जलाया है कि अभी भी जला रहे हैं? जलाया है? जो समझते हैं हमने योग अग्नि से अपने पहले के संस्कार जलाया है, जल गये वह हाथ उठाओ। जल गये कि अभी भी आते हैं? थोड़ा-थोड़ा तो आते हैं? बापदादा के पास जब अपना चार्ट भेजते हैं ना तो कहते हैं बहुत तो चले गये, कहने में चतुर हैं ना! तो कहते हैं बहुत तो खत्म हो गये, कभी-कभी थोड़ा इमर्ज हो जाता है। लेकिन जलना माना जलना। जलने के बाद नाम निशान ही नहीं रहता। मारने के बाद शरीर का यादगार तो दिखाई देता है, लेकिन जलने के बाद समाप्त हो जाता है। जैसे रावण को भी देखो सिर्फ मारा नहीं जलाया भी, जो बिल्कुल नाम-निशान खत्म। तो आप भी सब अपने को नोट करो संस्कारों को मारा है या जलाया है? भस्म किया है? पुराने संस्कार को अगर जलाया नहीं, तो बीच-बीच में इमर्ज हो जाते हैं। लेकिन भक्तों ने कॉपी सब की है। आप जलाते हो वह भी जलाते हैं फिर मनाते हैं। बिना जलाने के मनाते नहीं हैं। तो आप तो संस्कारों को जलाते हुए होली बन गये हो। कोई बन रहे हो, कोई बन गये हो। तो आपने होली मनाई? बाप के संग के रंग की। अभी संग में बैठे हो ना, तो संग के रंग की होली मना ली ना! मनाई? हाथ उठाओ। मना ली। होली मनाना अर्थात् होली बनना, पवित्र बनना। जैसे बाप वैसे बच्चे हैं। अगर मानों आपका कोई संस्कार जो जला नहीं है, इमर्ज हो जाता है तो अच्छा लगता है? संकल्प आता है ना कि अभी तीव्र पुरुषार्थ से इसको जलाना ही है। सिर्फ मारना नहीं है, क्या है कोई-कोई ने संस्कार को मारा है, तो मरे हुए में कभी जान फिर से आ जाती है। अगर जला दो तो फिर कभी नहीं आयेगा।

तो आज जलाना है या मारा हुआ ही ठीक है? जलाने की शक्ति है? है शक्ति? संकल्प कर सकते हैं? कई कहते हैं, बाप-दादा से रूहरिहान करते हैं ना। बहुत मीठी मीठी रूहरिहान करते हैं, कहते हैं बाबा हमने तो बहुत कोशिश की, फिर फिर आ जाता है। चाहता नहीं हूँ लेकिन आ जाता है। कारण पता है? जलाते हो, बापदादा देखते हैं, पुरुषार्थ बहुत करते हैं लेकिन पुरुषार्थ के साथ दृढ़ संकल्प की आवश्यकता है। दृढ़ता सफलता की चाबी है। जो दृढ़ संकल्प किया जाता है, दृढ़ का अर्थ ही है फिर वापस नहीं आयेगा। फिर पता है बहुत मीठी मीठी बातें करते हैं। जब फिर आ जाता है ना तो क्या कहते हैं? रूहरिहान तो सभी करते हैं ना! बहुत मीठी रूहरिहान करते हैं, कहते हैं चाहते तो नहीं है, आ जाता है। तो शक्ति कम है ना! दृढ़ता कम है ना! दृढ़ संकल्पधारी बनो। करना ही है। और उस दृढ़ संकल्प को रोज़ चेक करो किस कारण से फिर दृढ़ता में कमजोरी आई? और उस सरकमस्टांश के ऊपर विशेष अटेन्शन देते रहो कि यह फिर से नहीं आवे। मास्टर सर्व-शक्तिवान की सीट पर बैठके उस संकल्प को, संस्कार को समाप्त करो। कई बच्चे कहते हैं कि हम कई बार अनुभव करते हैं कि कभी-कभी जब कोई शक्ति चाहते हैं ना तो उस समय पर वो शक्ति नहीं आती। वैसे शक्ति है लेकिन समय पर कभी शक्ति को इमर्ज करते हैं ना तो भी नहीं आती। है मास्टर सर्वशक्तिमान। आपका टाइटिल क्या है? मास्टर सर्वशक्तिमान और कहते क्या हैं? शक्ति समय पर नहीं आती। कारण? अपने मास्टर सर्वशक्तिमान की सीट पर सेट नहीं होते। अभी दफ्तर में भी जाओ तो जो करने वाले को अथॉरिटी होगी वह आर्डर करेगा तो मानते हैं ना। ऐसा दूसरा कोई कहे तो मानेंगे क्या? तो आपकी सीट है मास्टर सर्वशक्तिमान। उस सीट पर सेट नहीं होते तो आवाह्न करते भी शक्ति समय पर नहीं आती। इसके लिए बापदादा ने बार-बार कहा है अपने मन को बिजी रखो। कभी किस शक्ति को सारे दिन में इमर्ज रखो, कभी किसी शक्ति को इमर्ज करके देखो कि उसकी ताकत क्या है? ऐसे अनुभव करते रहेंगे, अपनी सीट पर सेट रहेंगे तो शक्ति आपके आगे सदा जी हाज़िर होगी। आपकी शक्ति है ना! तो होली मनाई? आप तो सदा होली मनाते रहते। सदा बाप के संग का रंग लगाते ही रहते। रंग में रंगे हुए हैं ना? अच्छा।

आज बापदादा हर बच्चे को एक स्वमान देते हैं - हर बच्चा दृढ़ संकल्पधारी विशेष आत्मा बनो। संकल्प किया और हुआ, इसको कहा जाता है दृढ़ संकल्प। कहते हैं दृढ़ संकल्प किया लेकिन दृढ़ता माना ही सफलता। अगर सफलता नहीं है तो दृढ़ता नहीं कहेंगे। तो अभी दृढ़ता भव! यह अपना विशेष स्वमान रोज़ अमृतवेले स्मृति में लाना और उस विधि पूर्वक आगे बढ़ना। संगमयुग का समय बहुत प्यारा है, एक सेकण्ड नहीं है, एक सेकण्ड एक वर्ष की प्राप्ति समान है इसलिए बापदादा कहते ही रहते हैं, एक सेकण्ड भी व्यर्थ नहीं जाये। एक संकल्प भी व्यर्थ नहीं जाये। समर्थ बनो और समर्थ बनाओ। ठीक है ना! अच्छा।

चारों ओर के होलीएस्ट बच्चों को जो हर कदम में मेरा बाबा, मेरा बाबा कहते हुए उड़ रहे हैं और सदा अपने तीव्र पुरुषार्थ द्वारा आगे बढ़ रहे हैं और बढ़ाते रहते हैं ऐसे बापदादा के दिल के नूरे रत्नों को बापदादा बहुत बहुत बहुत बहुत दिल का प्यार दे रहे हैं। साथ में होली की मुबारक भी दे रहे हैं क्योंकि वास्तव में आप ही होली हो और कोई डबल होली तो बनते नहीं। आप ही डबल होली बनते हो इसीलिए पदमगुणा मुबारक हो, मुबारक हो।

वरदान:-
स्वयं पर बापदादा को कुर्बान कराने वाले त्यागमूर्त, निश्चयबुद्धि भव

“बाप मिला सब कुछ मिला'' इस खुमारी वा नशे में सब कुछ त्याग करने वाले ज्ञान स्वरूप, निश्चयबुद्धि बच्चे बाप द्वारा जब खुशी, शान्ति, शक्ति वा सुख की अनुभूति करते हैं तो लोकलाज की भी परवाह न कर, सदा कदम आगे बढ़ाते रहते हैं। उन्हें दुनिया का सब कुछ तुच्छ, असार अनुभव होता है। ऐसे त्याग मूर्त, निश्चयबुद्धि बच्चों पर बापदादा अपनी सर्व सम्पत्ति सहित कुर्बान जाते हैं। जैसे बच्चे संकल्प करते बाबा हम आपके हैं तो बाबा भी कहते कि जो बाप का सो आपका।

स्लोगन:-
सहजयोगी वह हैं जो अपने हर संकल्प व कर्म से बाप के स्नेह का वायब्रेशन फैलाते हैं।

ये अव्यक्त इशारे - ब्रह्मा बाप समान सम्पन्न और सम्पूर्ण स्थिति का अनुभव करो

आप सभी ब्राह्मण आत्माओं ने जन्म लेते ही यह व्रत लिया है कि हमें बाप समान सम्पन्न और सम्पूर्ण बनना है। जैसे सभी एवररेडी शब्द बोलते हो ऐसे सम्पन्न और सम्पूर्ण बनने में एवररेडी बनो, इसमें अलबेलापन न आये।