02-08-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति 17.02.2011 "बापदादा" मधुबन
“मन्सा सेवा द्वारा
आत्माओं को अंचली देने की सेवा करते, बहुतकाल से तीव्र पुरुषार्थ कर एवररेडी रहो तो
माला का मणका बन जायेंगे''
आज स्नेह के सागर अपने
स्नेही बच्चों से मिलने आये हैं। बच्चों ने याद किया मेरे बाबा आ जाओ तो बाप कहते
हैं मेरे स्नेही बच्चे, स्नेह में ऐसा आकर्षण है जो हर बच्चे ने बाप को अपना बनाया
और बाप ने हर बच्चे को मेरे बच्चे कहते अपने में समाया। कमाल है, बच्चों ने कहा मेरे
बाबा तो मेरे शब्द में इतना स्नेह भरा हुआ है जो बाप ने भी कहा मेरे बच्चे, स्नेह
क्या से क्या बना देता है। हर बच्चे के मस्तक में आज स्नेह की लहरें लहरा रही हैं,
यह देख बापदादा हर्षित हो रहे हैं। स्नेह ही दिल को अपना बनाने वाला साधन है। तो हर
एक बच्चे के अन्दर आज स्नेह की लहरें लहराती हुई देख-देख बापदादा भी खुश हो रहे
हैं।
अभी-अभी 5 मिनट के
लिए एक ड्रिल बापदादा सबको करा रहे हैं। अपने मन्सा शक्ति से सृष्टि में जो भी आपके
भक्त वा अनेक दु:खी अशान्त आत्मायें आपको याद कर रही हैं, हे हमारे पूर्वज हमें थोड़े
समय के लिए भी शान्ति दे दो, जरा सा सुख की अंचली दे दो, बचाओ ऐसी आत्माओं को यहाँ
बैठे हुए इमर्ज करो, आवाज सुनने आ रहा है! बचाओ, बचाओ..., तो ऐसी आत्माओं को अपने
मन्सा शक्ति द्वारा सुख शान्ति की किरणें पहुंचाओ। यह मन्सा सेवा सारे दिन में
बार-बार करते रहो क्योंकि बाप के साथ आप बच्चे भी विश्व सेवक हो। सारा दिन वाणी
द्वारा जैसे सेवा के निमित्त बनते हो, ऐसे ही बीच-बीच में मन्सा सेवा का भी अभ्यास
करते चलो। इसमें आपका अपना भी फायदा है क्योंकि अगर आपका मन सदा सेवा में बिजी रहेगा
तो आपके पास जो बीच-बीच में माया फालतू संकल्प वा व्यर्थ संकल्प करती है, उससे बच
जायेंगे। मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। अभी बापदादा पूछते हैं कैसे हो? तो क्या जवाब देते
हो? पुरुषार्थ है लेकिन कभी कभी...! सदा का पुरुषार्थ नहीं चल रहा है। तो बापदादा
अभी सभी बच्चों का यह रिकार्ड देखने चाहते हैं, यह कभी-कभी का शब्द समाप्त हो जाए।
क्या यह हो सकता है, कभी-कभी समाप्त हो जाये? समय पर तैयार हो जायेंगे? हो रहे हैं,
होना ही है..., इसके बजाए अभी एवररेडी बन सकते हैं? क्यों? एवररेडी रहने का अभ्यास
मायाजीत, मनजीत जगतजीत यह संस्कार भी बहुत समय से बनायेंगे तब अन्त समय भी यह
बहुतकाल का अभ्यास विजयी बनाकर आपको विशेष माला का मणका बनायेगा। पास विद ऑनर बनेंगे।
पास नहीं, पास विद ऑनर। तो बोलो, यह हिम्मत है ना! पास विद ऑनर तो होना है ना? जो
द्वापर से लेके अब तक पूज्य बनते हैं अर्थात् माला के मणके बनते हैं तो अपने को माला
के मणके बनाने का शुद्ध संकल्प है ना!
बापदादा भी रोज़
अमृतवेले अपने माला के मणकों को देखते और विशेष मिलन मनाते हैं। तो आप सभी अपने को
माला के मणकों में समझते हो। है तो दूसरी माला भी 16 हजार की, लेकिन फिर भी सेकण्ड
माला हो गई। विशेष माला जो गायन और पूज्यनीय योग्य बनती है, वह पहली माला है। तो आज
बापदादा उन मणकों को देख रहे थे क्योंकि ब्रह्मा बाप के साथ विशेष राज्य अधिकारी
साथी वही बनते हैं। तो आज ब्रह्मा बाप अपने अब के तीव्र पुरुषार्थी और भविष्य के
राज्य अधिकारी, तख्त पर तो दो ही बैठते हैं लेकिन राज्य के साथी उन्हों की पहली माला
है। तो अपने को चेक किया है। बापदादा के साथ तो चलेंगे क्योंकि अभी आप सबकी रिटर्न
जरनी है। जब जाना ही है, बाप के साथ जाना है, अकेला नहीं जाना है। तो साथ जाने वाले
नजदीक के मणके कौन होंगे? जो बहुतकाल के तीव्र पुरुषार्थी होंगे। पुरुषार्थी नहीं,
कब-कब वाले नहीं। बहुतकाल के बाप समान ही राज्य अधिकारी बनेंगे। तो क्या समझते हो?
तीव्र पुरुषार्थ है? जो समझते हैं मैं तीव्र पुरुषार्थी की लाइन में हूँ, वह हाथ
उठायेंगे। तीव्र पुरुषार्थी, बड़ा हाथ उठाओ, छोटा हाथ उठाते हैं। अच्छा, बहुत उठा
रहे हैं। फिर लम्बा हाथ उठाओ, ऐसे (छोटा) नहीं। अच्छा।
बापदादा तो रोज़ बच्चों
का चार्ट देखते हैं। मैजारिटी तीव्र पुरुषार्थी भी हैं लेकिन कभी-कभी का शब्द भी
साथ में लगा देते हैं। लेकिन बाप क्यों कह रहे हैं? अटेन्शन प्लीज़, सूक्ष्म संकल्प
में भी हलचल नहीं हो। अचल, अडोल, शुद्ध संकल्पधारी बहुत समय से बनना ही है। कई बच्चे
बहुत मीठी-मीठी रूहरिहान करते हैं, कहते हैं बाबा हम तैयार हो ही जायेंगे क्योंकि
समय जितना नजदीक आयेगा, हालतें हलचल में आयेंगी तो वैराग्य तो आटोमेटिकली आ जायेगा।
लेकिन आपका टीचर कौन हुआ? समय या बाप? समय तो आपकी रचना है। तो बाप अभी इशारा दे रहा
है कि बहुत समय का तीव्र पुरुषार्थ अन्त में पास विद ऑनर बनायेगा। पास तो सभी होंगे
लेकिन पास विद ऑनर बनने वाला बहुत समय का लगातार तीव्र पुरुषार्थ करने वाला आवश्यक
है इसलिए आज की तारीख नोट कर दो, अब भी कभी-कभी, समथिंग, हो जायेंगे, कर ही लेंगे...
यह शब्द आगे भी चलते न रहें। बाप का प्यार तो सदा ही है। लास्ट दाने पर भी बाप का
प्यार है। क्यों? दिल से मेरा बाबा तो कहा, आज की बड़ी-बड़ी आत्मायें मेरा बाबा नहीं
कहती, लेकिन वह मेरा बाबा तो मानता है इसलिए बाप का प्यार तो उससे भी है। बच्चों से
प्यार तो बाप का सदा ही है, लास्ट तक भी है, लास्ट वाले तक भी है। स्नेह ने ही आपको
बाप का बनाया है। बापदादा ने यह भी कहा है कि स्नेह मैजारिटी बच्चों का है और रहेगा
लेकिन सिर्फ स्नेह नहीं, शक्ति भी चाहिए। तीव्र पुरुषार्थ भी चाहिए।
बापदादा का तो बच्चों
में फेथ है ना। तो अभी से ही पदम पदमगुणा ऐसे बच्चों को मुबारक दे रहे हैं। वाह
बच्चे वाह! हिम्मत वाले हैं। आपकी हिम्मत और बाप की मदद तो होगी ही। अभी एक बात करना।
जो अपने मन को बिजी रखने के लिए, जैसे पहले बाप ने कहा सेकण्ड में स्टाप, बिन्दू
हूँ, बिन्दू लगाना है और सबको बिन्दू रूप में देखना है। जब देखेंगे ही बिन्दू तो और
कोई भी संकल्प नहीं चलेगा। मन्सा सेवा का अटेन्शन रखना, इतनी दु:खी आत्मायें जो
चिल्ला रही हैं, उन्हों को किरणें देने की सेवा में एकस्ट्रा मन को लगाना। मन्सा
सेवा बहुत श्रेष्ठ सेवा है। दु:खियों का भी फायदा और आपका अपना भी फायदा। डबल फायदा
है। जैसे वाचा से सेवा करते हो और सेवा बढ़ती भी जाती है, दिल से करते हो, संख्या
भी बढ़ती जाती है, सेन्टर भी बढ़ते जाते हैं, वाचा की सेवा मैजारिटी की ठीक है। सभी
की नहीं, मैजारिटी की। ऐसे अभी मन से विशेष आत्माओं को अंचली देने की सेवा भी करते
रहो। मन को फ्री नहीं छोड़ो। कोई न कोई सेवा में मन से शक्तियां देने की, मुख से
वाणी की सेवा, कर्म में गुणों से सेवा, सम्बन्ध-सम्पर्क में खुशी देने की सेवा, इस
भिन्न-भिन्न सेवाओं में मन को बिजी रखो क्योंकि सारे विश्व में रिचेस्ट आत्मायें
कौन सी हैं? आप ही हो ना! कितने खजाने मिले हैं? तो हर खजाने से सेवा करो। खजाने को
जितना सेवा में लगायेंगे, उतने खजाने बढ़ते जायेंगे इसलिए अभी जैसे स्व की सेवा का
अटेन्शन देते हो, ऐसे दु:खी आत्माओं की, अपने भक्तों की मन्सा द्वारा किरणें देने
की सेवा भी अटेन्शन देकर सारे दिन में करो, बहुत चिल्लाते हैं, आपको सुनने नहीं आता।
मैजारिटी हर घर में कोई न कोई दु:ख का कारण है। ऐसे दु:खियों को सुख देने वाला कौन?
बोलो, कौन है? आप ही तो हो। तो इस मन्सा सेवा को सारे दिन में चेक करो - कितना समय
की? जैसे स्व के प्रति देते हो, वैसे मन्सा सेवा के प्रति कितना समय दिया? रहमदिल
हो ना। तो दु:खियों पर रहम करो। आपका गीत भी है ना, ओ माँ बाप दु:खियों पर रहम करो।
बापदादा को बहुत आवाज सुनने पड़ते हैं। आप लोगों को कम सुनाई देते हैं लेकिन अभी
सुनो। कहाँ जायेंगे वह, आपके ही तो भाई बहिन हैं। तो अपना भी फायदा करो, मन को बिजी
रखो और दु:खियों का दु:ख हरण करो। चिल्लाते हैं, दिल चिल्लाती है। बापदादा तो सुनते
हैं, तो बच्चों को याद करते हैं ओ मेरे लाडले बच्चे, सिकीलधे बच्चे अब रहमदिल रूप
धारण करो। अपने ब्राह्मणों में भी एक दो के सहयोगी बनो। चाहे कैसा भी संस्कार है,
लेकिन आपका काम क्या है? संस्कार से टक्कर खाना या उनको भी संस्कार के टक्कर से
छुड़ाना। आपका भी टाइटल है ना, दु:ख हर्ता सुख कर्ता। बाप के साथी हो ना। बाप के
साथी क्या संकल्प किया है? इस विश्व को दु:ख अशान्ति से बदल सुख शान्ति स्थापन करनी
ही है। करनी है ना! हाथ उठाओ। करनी है? कि सिर्फ देखना है, हो रहा है लेकिन अभी
बदलना है। चाहे ब्राह्मण आत्मा हो, देखते नहीं रहो, यह कर रहे हैं लेकिन उन्हों को
भी वाणी और मन्सा संकल्प द्वारा परिवर्तन करो, करना नहीं चाहिए! बापदादा सुनता रहता
है, बापदादा तक बात दे दी, जब बात दे दी तो खुद बाप के डायरेक्शन पर चलो, जिम्मेवार
बापदादा और उनके साथी मुरब्बी बच्चे, निमित्त बने हुए बच्चे हैं। तो सदा अपने मन को
व्यर्थ संकल्पों के बजाए अब दु:खी आत्माओं को, चाहे ब्राह्मण हैं या कोई भी हैं,
डिस्टर्ब आत्मा को सहयोग दो। सहयोगी बनो। अच्छा।
नये-नये बच्चे जो पहली
बार आये हैं उन्हें एक सेकण्ड में 10 मिनट का काम करना है। समय को जरा भी व्यर्थ नहीं
करना, अटेन्शन देना। अपना पुरुषार्थ तीव्र कर जितना आगे बढ़ने चाहो उतना बढ़ सकते
हो। यह आप सभी को सभी ब्राह्मणों की तरफ से, बाप की तरफ से शुभ भावना, शुभ कामना
है। अच्छा। (सभी मधुबन वाले उठो)
मधुबन वाले अगर नहीं
होते तो आपकी मेहमान निवाज़ी कौन करता। आराम से आते हो, खाते हो, पीते हो, रिफ्रेश
होते हो तो मधुबन वालों के लिए ताली बजाओ। बापदादा जानते हैं कि जगह कम होने के
कारण मधुबन वालों को थोड़ा दूर बैठकर सुनना पड़ता है। यह भी सेवा है, मधुबन वालों
की यह भी सेवा है। दूसरों को सुख देना, सुखदाता हो गये ना। तो मधुबन वालों का काम
है सुख देना और सुख लेना क्योंकि जो भी आते हैं उन्हों के अनुभवों से आप अनुभव
सुनाते हो, उस अनुभव से एक दो को फायदा हो जाता है। कई फायदे होते हैं लेकिन टाइम
कम होने के कारण सुनाते कम हैं। लेकिन मधुबन वालों का टाइटल क्या हुआ? सुख देना और
सुख लेना। सुखदाता के बच्चे फालो फादर करने वाले हैं। अच्छा
इस बारी जो आये हैं
उसमें मुरली रेग्युलर जो सुनते हैं, कोई हैं जो मुरली नहीं सुनते, वह हाथ उठाओ। कोई
नहीं। अच्छा। वह उठो जो नहीं पढ़ते या सुनते हैं। थोड़े हैं। कोई बात नहीं लेकिन अभी
बाकी जो भी समय मिला है उसमें बाप के महावाक्य जरूर सुनना या पढ़ना। परमधाम से
बापदादा आता है, सूक्ष्मवतन से ब्रह्मा बाबा आता है, और आके महावाक्य उच्चारण करते
हैं इसलिए मुरली कभी भी एक दिन भी मिस नहीं करना। मिस करेंगे तो अपना बापदादा का
दिलतख्त छूट जायेगा इसलिए जो भी मुरली मिस करते हैं वह समझें हम तीन तख्त के मालिक
नहीं, दो तख्त के मालिक भी यथाशक्ति बनेंगे इसलिए मुरली, मुरली, मुरली क्योंकि मुरली
में रोज़ के डायरेक्शन होते हैं, चार ही सब्जेक्ट के डायरेक्शन होते हैं, तो रोज़
के डायरेक्शन लेने हैं ना। तो जो भी मिस करता हो, कारणे-अकारणे वह अपना प्रोग्राम
बनावे कि कैसे मुरली सुनें। कोई न कोई सैलवेशन बनायें। आजकल साइंस के साधन आपके लिए
निकले हैं। ब्रह्मा बाप में प्रवेशता के 100 साल पहले यह साइंस निकली है, आपके काम
में भी आनी है इसलिए उसको यूज़ करो, फायदा उठाओ। अच्छा - सामने बैठे हुए या कहाँ भी
सुनने वाले बच्चों को बापदादा की दिल व जान सिक व प्रेम से यादप्यार और नमस्ते।
सेवा का
टर्न-यू.पी.बनारस का है:-
यू.पी. से ब्रह्मा बाप का, जगत अम्बा का बहुत प्यार रहा है। जितना ब्रह्मा बाबा
यू.पी. में आये हैं इतना बाम्बे में भी आये हैं, लेकिन यू.पी. में भी आये हैं। तो
जिस जगह ब्रह्मा बाप के पांव पड़े वह स्थान कितना भाग्यवान है। लखनऊ और कानपुर दोनों
ही इस भाग्य के अधिकारी बने हैं। बाम्बे भी बना है लेकिन अभी यू.पी. का टर्न है।
डायरेक्ट माँ और बाप के शिक्षा की बूंदे यू.पी. में पड़ी हैं। अभी यू.पी. को आगे
क्या करना है? वाणी द्वारा मेलों में सेवा तो करते हो लेकिन अभी के समय अनुसार जो
बापदादा कहता आया है पहले भी कि वारिस और नामीग्रामी माइक, नामीग्रामी का अर्थ यह
है कि उनके कहने का प्रभाव सुनने वालों पर पड़ने वाला हो, ऐसे माइक तैयार करो। ऐसे
वारिसों का ग्रुप हर सेन्टर पर हो। कितने सेन्टर हैं यू.पी. में, बहुत हैं ना! तो
इतने वारिस निकालने चाहिए। हिसाब करना कितने सेन्टर हैं और कितने वारिस बने हैं? और
जितने बनने चाहिए उतने बने हैं या बनाने हैं? अगर बनाने हैं तो समय पर कोई भरोसा नहीं
है, जल्दी से जल्दी वारिस और माइक निकालो, जिनकी आवाज से अनेक आत्माओं के भाग्य की
रेखा खुल जाए क्योंकि आपने तो बहुत सेवा की, जो पुराने हैं उन्होंने तो बहुत सेवा
की। अभी सेवा कराओ। करने वाले तैयार करो। कर सकते हैं ना! हाथ उठाओ टीचर्स। अच्छा।
टीचर्स भी बहुत हैं। तो इतने ही तैयार करो। हर एक सेन्टर चाहे छोटा चाहे बड़ा,
सेन्टर की लिस्ट में है उनको जरूर अपना सबूत देना है क्योंकि समय पर कोई भरोसा नहीं
है। कब भी क्या भी हो सकता है इसलिए बापदादा सभी जो भी ज़ोन आते हैं, नहीं भी आये
हैं, सभी ज़ोन को यही कहते हैं कि अभी आगे बढ़ो। क्लासेज तो चलते रहते हैं, संख्या
भी बढ़ती रहती है लेकिन अभी निमित्त बनने वाले बनाओ और बनाने के लिए बापदादा ने देखा
है, हर ज़ोन में ऐसी आत्मायें हैं जो निमित्त बन सकती हैं। तो यू.पी. एक तो भक्तों
का कल्याण करो, भक्त कहलाने वाले भले थोड़े हैं, लेकिन भक्त भी हैं। उन्हों को भक्ति
का फल दिलाओ। बहुत मेहनत करते हैं। बापदादा ने देखा कि हर एक अपने पुरुषार्थ में बढ़
भी रहे हैं लेकिन अभी भी बढ़ने की मार्जिन हैं। कर रहे हो, ऐसे नहीं, नहीं कर रहे
हो। कर भी रहे हो लेकिन थोड़ी और स्पीड बढ़ाओ। अच्छे हो और अच्छी सेवा करते हो। सभी
दादियां भी आप लोगों को मुबारक देती हैं। पाण्डव भी कितने आते हैं। पाण्डव भी कम नहीं
हैं। कई ऐसी सेवायें हैं जो पाण्डव ही कर सकते हैंइसलिए पाण्डवों को भी बापदादा और
सर्व मधुबन निवासी मुबारक दे रहे हैं। अच्छा।
वरदान:-
बुद्धि रूपी
पांव मर्यादा की लकीर के अन्दर रखने वाले सर्व प्राप्ति सम्पन्न शक्तिशाली भव
जो बच्चे बुद्धि रूपी
पांव जरा भी मर्यादा की लकीर से बाहर नहीं निकालते वे लक्की और लवली बन जाते हैं।
उन्हें कभी कोई भी विघ्न अथवा तूफान, परेशानी, उदासी आ नहीं सकती। यदि आती है तो
समझना चाहिए कि जरूर बुद्धि रूपी पांव मर्यादा की लकीर से बाहर निकाला है। लकीर से
बाहर निकलना अर्थात् फकीर बनना इसलिए कभी फकीर अर्थात् मांगने वाले नहीं, सर्व
प्राप्ति सम्पन्न शक्तिशाली बनो।
स्लोगन:-
जो सदा न्यारे और बाप के प्यारे हैं वह सेफ रहते हैं।
ये अव्यक्त इशारे -
अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो
दृढ़ता सफलता की चाबी
है। सफलता आप बच्चों का जन्म सिद्ध अधिकार है, इसलिए दृढ़ता को यूज़ करो, अलबेले नहीं
बनो, हो जायेगा, कर लेंगे.. यह नहीं सोचो। दृढ़ संकल्प से मन के व्यर्थ संकल्पों को
समाप्त कर विजयी बनो।