07-06-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति 31.03.2010 "बापदादा" मधुबन
पूर्वज और पूज्य के
स्वमान में रह मन्सा द्वारा सर्व की पालना करो, पूरे वृक्ष को सकाश दो
आज बापदादा अपने चारों
ओर के पूर्वज और पूज्य आत्माओं को देख रहे हैं। पूर्वज आत्मायें अपने को समझते हो
ना। पूज्य आत्माओं का निवास कहाँ है? अपने झाड़ को सामने लाओ, उसमें देखो आपका
स्थान कहाँ है? जानते हो कि आप पूर्वजों का स्थान जड़ में है। झाड़ के जड़ में भी
है, तना में भी है। तो जड़ के द्वारा ही सारे वृक्ष को पालना मिलती है। तो आप इस
सारे वृक्ष के टाल टालियां वा पत्तों की पालना करने वाले, सकाश देने वाले पूर्वज
हो। पूर्वज के साथ पूज्य भी हो। तना द्वारा लास्ट पत्ते को भी सकाश मिलती है। तो
अपने को सारे वृक्ष को सकाश देने वाले अनुभव करते हो? नशा रहता है कि हम पूर्वज
सर्व आत्माओं रूपी टाल टालियां या पत्तों को सकाश दे रहे हैं! जैसे ब्रह्मा बाप को
ग्रेट ग्रेट ग्रैण्ड फादर कहते हैं तो उनके आप साथी बच्चे भी मास्टर ग्रेट ग्रेट
ग्रैण्ड फादर हो। सारे वृक्ष के आत्माओं की आप पूर्वज आत्माओं की तरफ आकर्षण है। आप
पूर्वज आत्मायें उन्हों की पालना शक्तियों द्वारा करते हो। जैसे आप सभी पूर्वज
आत्माओं की पालना बाप ने की तो बाप ने कैसे की? शक्तियों द्वारा। वैसे आप भी पूर्वज
के नाते से शक्तियों द्वारा उन्हों की पालना करने वाले हो। आजकल देखते हो कि सभी
आत्मायें दु:खी हैं, पुकार रही हैं, अपने-अपने देवी देवताओं को, आओ हमारी रक्षा करो,
हमें शान्ति दो, हमें शक्ति दो। ओ क्षमा के सागर पूर्वज हमें पालना दो। तो यह आवाज
आप पूर्वज आत्माओं के कानों में सुनाई दे रहा है? अनुभव करते हो कि हम ही पूर्वज
हैं? सारे वृक्ष में देखो जो अन्य धर्म वाली आत्मायें भी हैं तो वृक्ष में टाल
टालियां होने के कारण वह भी आपको उसी नज़र से देखते हैं। उन्हों के भी पूर्वज आप ही
हो। कोई भी धर्म वाली आत्माओं से आप जब मिलते हो तो यह समझते हो कि यह भी हमारे ही
वृक्ष की टाल टालियां हैं! वह भी जब आपसे मिलते हैं तो समझते हैं कि यह अपने हैं!
अपनेपन का अनुभव उन आत्माओं को भी हो रहा है और होना है। तो इतना नशा, इतना अन्दर
से आप लोगों के पास रहम आता है? वह चिल्ला रहे हैं रहम करो... तो अभी समय अनुसार आप
सभी पूर्वज आत्माओं को मन्सा द्वारा शक्तियों की पालना करनी है। उन्हों को आवश्यकता
है। तो जितना आप अपने पूर्वज के नशे में रहेंगे उतना ही आप द्वारा उन्हों की पालना
होगी। वैसे भी देखो किसी की भी पालना लौकिक में भी बड़ों से होती है। वही उन्हों के
शरीर के खाने पीने, पढ़ाई जो सोर्स आफ इनकम है, उनका प्रबन्ध करते हैं। तो जैसे बाप
ने आप सभी बच्चों की भिन्न-भिन्न शक्तियों से पालना की है वैसे अभी आपका कार्य है
सारे वृक्ष के टाल टालियों और पत्तों की पालना करना। ऐसा उमंग आप पूर्वज आत्माओं को
आता है? नशा है? पूज्य भी हो। देखो, सारे ड्रामा में जितनी आप आत्माओं की कायदे
प्रमाण पूजा होती है उतनी पूजा कोई भी महात्मा, धर्म पिता की नहीं होती। आपकी पूजा
नियम प्रमाण आरती होना, भोग लगना, ऐसी किसकी भी नहीं होती। गायन देखो आपका कायदे
प्रमाण कीर्तन होता है। किसी का भी ऐसे गायन नहीं होता। तो आप पूर्वज के साथ पूज्य
भी हो। ड्रामा में आप जैसा पूजन और गायन किसी का भी नहीं है।
बापदादा ऐसी आप पूज्य
और पूर्वज आत्माओं को देख कितना खुश होते हैं! बाप के दिल से बार-बार यह गीत बजता
वाह मेरे सर्व वृक्ष के पूर्वज और पूज्य आत्मायें वाह! तो आजकल बापदादा आप सभी बच्चों
को जो आपका स्वमान है, बाप समान सम्पन्न सम्पूर्ण बनने का, वही रूप देखने चाहते
हैं। उसके लिए एक बात बच्चों को ध्यान में रखनी है, बापदादा ने देखा कि सभी बच्चे
पुरुषार्थ बहुत अच्छा भी करते हैं लेकिन सदा शब्द हर एक को अपने पुरुषार्थ में एड
करना है। अटेन्शन देना है। बापदादा बच्चों से पूछते हैं कि जैसे बापदादा आप सभी
बच्चों को श्रेष्ठ स्वमानधारी आत्मा के रूप से देखते हैं, वैसे आप अपने को भी ऐसे
स्वमानधारी समझते हो?
बापदादा ने देखा कि
बच्चे भी चाहते हैं कि हम भी अभी अपने राज्य में चलें। “अब घर जाना है''। यह भी गीत
मन में गाते रहते हैं - अब घर जाना है, अब रिटर्न जरनी करनी है। इसके लिए बापदादा
ने पहले ही कहा कि सारा समय अपने को कोई न कोई सेवा में बिजी रखो। बापदादा ने देखा
है सेवा की रूचि, सेवा का उमंग-उत्साह अभी भी बच्चों में है। अच्छी सेवा के समाचार
भी बापदादा सुनते हैं। लेकिन बापदादा तीव्रगति में आगे बढ़ने के लिए बच्चों को
विशेष अटेन्शन दिलाते हैं कि सिर्फ एक वाचा की सेवा नहीं, सेवा करते हो तो एक ही
समय पर तीन सेवायें इकट्ठी करो - मन्सा द्वारा सकाश दो, वाचा द्वारा ज्ञान दो और
कर्मणा अर्थात् अपने सम्पर्क द्वारा, सम्बन्ध द्वारा, चेहरे द्वारा ऐसी सेवा करो जो
उसका भी प्रभाव साथ-साथ सेवा में हो। एक समय में तीन सेवा इकट्ठी करो क्योंकि अभी
आत्मायें सेवा के लिए चाहती हैं, कुछ फर्क हो। कुछ बदलना चाहिए। तो एक समय पर तीनों
सेवा कर सकते हो? कर सकते हो? चेक करते हो कि जिस समय वाणी की सर्विस करते उस समय
मन्सा द्वारा और कर्मणा अर्थात् सम्पर्क-सम्बन्ध द्वारा भी सेवा हो रही है! होती है
साथ-साथ? जो समझते हैं कि हम एक ही समय में तीन सेवा करते हैं, वह हाथ उठाओ। एक ही
समय तीन सेवा। तो अभी अटेन्शन प्लीज़। कभी कभी नहीं। क्या होता है? सेवा तो करते
हैं लेकिन सेवा में साथ-साथ अपने में और साथियों में सन्तुष्टता क्योंकि सेवा का फल
है सन्तुष्टता वा खुशी। तो चेक करो सेवा तो की लेकिन पहले भी सुनाया कि सेवा की खुशी
तब होती है जब स्वयं, साथी और वायुमण्डल सभी सन्तुष्टता के वायब्रेशन में हो। सेवा
के सफलता की तीन बातें विशेष सुनाई थी, याद होंगी। पहला नम्बर सेवा अर्थात् निमित्त
भाव। दूसरा - निर्माण भावना। तीसरा - निर्मल वाणी। भाव, भावना और स्वभाव। यह सभी
साथ-साथ सेवा में हैं तो स्वयं भी सन्तुष्ट और साथी भी सन्तुष्ट और जिन्हों की सेवा
की वह भी आगे बढ़ते जायें। निमित्त भाव वाले बाप के तरफ सम्बन्ध जोड़ेंगे। अगर
निमित्त भाव नहीं तो बाप के नजदीक इतने नहीं आयेंगे। तो जब भी सेवा करते हो तो यह
चेक करो कि भाव, भावना और स्वभाव ठीक रहा? और आजकल बापदादा ने देखा कि जो मूल बात
है बापदादा की कि हर एक को और अपने को चाहे कहाँ भी सेवा के लिए जाते हो, तो यह चेक
करो कि साथी सन्तुष्ट रहे? क्योंकि सेवा की सफलता है - सन्तुष्टता का फल प्राप्त
होना। खुशी प्राप्त हो। साथ-साथ एक बात बापदादा इशारा देते हैं कि चलते फिरते,
संगठन में भी रहते हो, कोई न कोई का साथ सेवा में होता ही है, तो एक दो को आत्मा के
रूप में देखो। आत्मा के रूप में देखते भी हैं, अभ्यास भी करते हैं, लेकिन जब आत्मा
देखते हो तो आत्मा के ओरीज्नल संस्कार से देखते हो? या जो मिक्स संस्कार हैं, वह भी
दिखाई देते हैं? आत्मा देखो, इसमें पास हो, लेकिन किस संस्कार से देखते हो? क्या
आत्मा के ओरीज्नल संस्कार से कनेक्शन में आते हो? या वर्तमान संस्कार भी सामने आते
हैं? तो बाप कहते हैं कि आज से किसी को भी एक तो आत्मा रूप में देखो लेकिन आत्मा के
जो ओरीज्नल संस्कार हैं उस रूप में देखो। तो कभी भी आपस में जो कभी कभी बातें हो
जाती हैं, वह नहीं होंगी। अभी आत्मा रूप में देखते हो लेकिन साथ में वर्तमान
संस्कार भी सामने आ जाता है। तो आपस में जो सम्पूर्ण स्थिति होनी चाहिए, उसमें दूरी
पड़ जाती है। तो ओरीज्नल संस्कार वाली आत्मा देखो। तो यह जो अभी संगठन में रुकावट
आती है वह रुकावट खत्म हो जायेगी।
यह ब्राह्मण परिवार
श्रेष्ठ परिवार है। परिवार की बहुत महिमा है। यह ईश्वरीय परिवार बार-बार नहीं मिलता।
कल्प में एक ही बार यह ईश्वरीय परिवार मिला है, इतना बड़ा परिवार सारे कल्प में कभी
नहीं मिलता। परिवार की भी विशेषता को जानना और परिवार में चलना, एक महान सब्जेक्ट
है। पहले भी सुनाया था कि इस ज्ञान का फाउण्डेशन है निश्चय और निश्चय में चार बातें
हैं। बाप, दादा साथ में है ही और नॉलेज में, ड्रामा में, परिवार में सभी में निश्चय
हो। तो निश्चय बुद्धि हो, सहज पुरुषार्थी बन जाते हो। जैसे बापदादा में निश्चय है,
ऐसे परिवार में भी निश्चय आवश्यक है। जैसे देखो जब आप कोई भी बात की पैंकिग करते हो
तो क्या करते हो? चार ही तरफ टाइट करते हो ना, एक तरफ भी अगर टाइट नहीं किया तो
हलचल होती है। ऐसे ही बाप, नॉलेज, नॉलेज में भी विशेष ड्रामा और परिवार। अगर चार ही
बातें मजबूत नहीं हैं तो विघ्न आते हैं। विघ्नों को पार करने में अटेन्शन देना पड़ता
है इसलिए परिवार की पहचान, परिवार से प्यार, एक दो को समझना, यह बहुत आवश्यक है।
पूर्वज हो, पूज्य हो,
तो यह बातें भी अपने में या साथियों में लानी है। क्या भी हो, नम्बरवार तो हैं ना!
लेकिन ब्राह्मण परिवार का विशेष कार्य है दुआ देना, दुआ लेना। कई बच्चे कहते हैं कि
दूसरा क्रोध करता है, अभी दुआ लेगा कैसे! दुआ तो लेगा नहीं, क्रोध करेगा। बापदादा
कहते हैं अच्छा संस्कार वश वह बददुआ देता है, आप दुआ देने चाहते हो लेकिन वह बददुआ
देता है, लेकिन उसने बददुआ दी, लेने वाला कौन? लेने वाले आप हो या वह है? वह देने
वाला है, आप लेने वाले हैं। तो उसकी बददुआ आपने ली क्यों? अगर आत्मा को ओरीज्नल
संस्कार से देखो तो आपको रहम आयेगा। स्वयं भी सेफ रहो, बददुआ लो नहीं, लेने वाले आप
हो। न दो, न लो।
बापदादा आज सभी बच्चों
को होमवर्क देते हैं कि कभी भी किसी को आत्मा रूप में देखो, वर्तमान संस्कार के रूप
में नहीं देखो। आत्मा कहा तो उस आत्मा के जो निज़ी संस्कार हैं, उस निजी संस्कार के
रूप में, सम्बन्ध में भी आओ और दृष्टि में भी उसी दृष्टि से देखो तो यह जो विघ्न
पड़ते हैं जिसके कारण पुरुषार्थ में तीव्रता नहीं आती है, तो अभी वृत्ति बदलेंगे,
दृष्टि बदलेंगे तो बातें समाप्त हो जायेंगी। किसी की क्या भी बातें देखते हो,
बापदादा ने पहले भी कहा है तो सदा आप ब्राह्मण परिवार का एक एक का फर्ज है - शुभ
भावना, शुभ कामना देना और शुभ भावना, शुभ कामना लेना। उस संस्कार से देखो और चलो।
एक और भी बात बताते हैं - पहले भी बताया है तो कहाँ कहाँ संगठन में कभी-कभी परदर्शन,
परचिंतन और परमत के तरफ आकर्षित हो जाते हैं। अभी इन तीन पर को काट दो, एक पर रखो -
वह एक पर है पर उपकार। पर उपकार करना है, पर उपकारी हैं। ब्राह्मणों का स्वभाव है
पर उपकारी। परदर्शन नहीं, यह पर काट दो। यह तीनों बहुत नुकसान देते हैं। इसीलिए अपना
स्वमान सदा यही याद रखो कि मुझ ब्राह्मण आत्मा का स्वमान ही है “पर उपकारी''। तो
दूसरी सीजन में बापदादा हर एक बच्चे में यह परिवर्तन देखने चाहते हैं। हो सकता है?
बापदादा मुबारक देते हैं, एक दो को अटेन्शन दिलाते रहना। क्या करना? रोज़ रात को
सोने के पहले बापदादा को गुडनाइट करने के पहले अपने सारे दिन का पोता-मेल देना।
अच्छा किया या बुरा किया? जो भी किया वह बाप को पोतामेल देके, अपने बुद्धि को खाली
करके गुडनाइट करना और बाप की याद में ही सो जाना। फिर आपकी नींद बहुत अच्छी होगी।
पहले अपने को खाली करना, बुद्धि में कोई बात नहीं रखना, बाप के रूप में सारा
पोतामेल सच्ची दिल का दे दिया तो आपको धर्मराजपुरी में जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
सच्ची दिल पर साहेब राज़ी हो जायेगा। तो होम वर्क मिला! एक तो अपने पूर्वज और पूज्य
स्वरूप की सेवा चलते फिरते कर सकते हो। बाप ने देखा यह जनक बच्ची ने तबियत खराब होते,
कराची की सेवा में विशेष मन्सा सकाश दी, चाहे निमित्त कोई भी है लेकिन इसने
प्रैक्टिकल में किया। वहाँ की आत्माओं को सकाश मिली। और आगे-आगे उमंग में बढ़ रहे
हैं। तो ऐसे बापदादा ने प्रैक्टिकल एक्जैम्पुल देखा। तो आप सभी भी कर सकते हो। दु:खी
को, चिल्लाने वाले को खुशी की लहर पहुंचा सकते हो। आपके भक्त आपको ही पुकार रहे हैं
- हमारी देवी हमारा देवता कब आके रहम करेंगे। आपको सुनाई नहीं देता लेकिन बाप को
बहुत सुनाई देता है। हर एक ईष्ट को पुकार रहे हैं। आप नहीं जानते हो कि हमारे भक्त
कौन से हैं लेकिन भक्त तो जानते हैं ना। वह तो पुकारते हैं और आप हर ब्राह्मण आत्मा
के भक्त हैं। चाहे ढीले हों चाहे होशियार हों, भक्त आपके भी हैं क्योंकि जड़ में
बैठे हो ना, तो आपका सकाश का पार्ट है। तो अभी मन्सा सेवा को बढ़ाओ। और जितना बिजी
रहेंगे ना उतना निर्विघ्न रहेंगे। कर सकते हो ना! मन्सा सेवा करना जानते हो ना!
अच्छा नियम पूर्वक करते हो या कभी कभी? अगर कभी कभी करते हैं तो उसको रेग्युलर करो
और अगर थोड़ी करते हैं तो उसको और बढ़ाओ क्योंकि सारे कल्प का आधार अभी की सेवा का
फल है। चाहे पुजारी बनेंगे, चाहे राज्य अधिकारी बनेंगे दोनों का आधार अभी की सेवा,
अभी की अवस्था, अभी का बोल, अभी का सम्बन्ध-सम्पर्क है इसलिए बापदादा यही चाहते हैं
कि जितनी परसेन्ट अभी है, उससे बढ़नी चाहिए। वैसे तो बापदादा पहले से ही कहते हैं -
करना है तो अभी करो। कभी नहीं। बापदादा को कभी के गीत बहुत सुनाते हैं। बहुत अच्छे
अच्छे करके सुनाते हैं लेकिन बापदादा को कभी के गीत अच्छे नहीं लगते। अभी अभी के
गीत अच्छे लगते। तुरत दान महापुण्य। तो समझा अभी क्या करना है? अच्छा।
बापदादा सभी चारों ओर
के बच्चों को देख खुश भी होते हैं क्योंकि बापदादा बच्चों के सिवाए अकेला कुछ नहीं
करने चाहता इसलिए हर रोज़ बच्चों का आह्वान करते रहते हैं। तीव्र पुरुषार्थी बच्चे,
मीठे बच्चे, प्यारे बच्चे अब चलो। अच्छा।
चारों ओर के बच्चों
को बापदादा देखकर चाहे सम्मुख बैठे हैं, चाहे कहाँ भी बैठे हैं लेकिन सभी को बाप
याद है। और बाप को भी कौन याद है? चारों ओर के बच्चे याद हैं क्योंकि बाप हर बच्चों
के लिए यही आशा रखते हैं कि हर बच्चा बाप समान बनना ही है। बाप की हर एक बच्चे में
जो आशायें हैं, वह जानता है कि नम्बरवार हैं लेकिन फिर भी अपने नम्बर अनुसार भी
सम्पन्न तो बनना है ना। हर एक के पुरुषार्थ को भी देखते हैं क्या-क्या कर रहे हैं,
बाप को बहुत प्यार आता है, बच्चे जब मेहनत करते हैं ना तो बहुत प्यार आता है कि
मेहनत से छूट जाएं। प्यार में खो जायें। प्यार में मैजारिटी पास हैं लेकिन बातों
में आ जाते तो बाप को भूल जाते।
चारों ओर के बच्चों
को बापदादा का पदम पदम गुणा प्यार और दिल का दुलार स्वीकार हो। सभी को, मालिक बच्चों
को बाप लाख-लाख बधाईयां दे रहे हैं। उड़ते चलो, उड़ाते चलो। अच्छा।
वरदान:-
स्व-स्थिति
द्वारा सर्व परिस्थितियों को पार करने वाले निराकारी, अलंकारी भव
जो अलंकारी हैं वे कभी
देह-अहंकारी नहीं बन सकते। निराकारी और अलंकारी रहना - यही है मन्मनाभव, मध्याजीभव।
जब ऐसी स्व-स्थिति में सदा स्थित रहते तो सर्व परिस्थितियों को सहज ही पार कर लेते,
इससे अनेक पुराने स्वभाव समाप्त हो जाते हैं। स्व में आत्मा का भाव देखने से
भाव-स्वभाव की बातें समाप्त हो जाती हैं और सामना करने की सर्व शक्तियां स्वयं में
आ जाती हैं।
स्लोगन:-
संकल्प का एक कदम आपका तो सहयोग के हजार कदम बाप के।
ये अव्यक्त इशारे -
सदा हर्षित रहने के लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ, सहनशील बनो।
जो अपनी वा दूसरों की
बीती को नहीं देखते हैं, सेकण्ड में फुलस्टाप लगाते हैं वह सरलचित होते हैं और जो
सरलचित होते हैं उनके नयनों से, मुख से, चलन से मधुरता व हर्षितमुखता प्रत्यक्ष रूप
में देखने में आती है। ऐसी सरलचित स्थिति वाले दूसरों को भी सरलचित बना देते हैं।
सरलचित माना जो बात सुनी, देखी, की, वह सार-युक्त हो और सार को ही उठाये।