01-05-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - तुमने रावण
की मत पर बाप की ग्लानी की तो भारत कौड़ी तुल्य बना, अब उसे पहचान कर याद करो तो
धनवान बन जायेंगे''
प्रश्नः-
सीढ़ी के
चित्र में कौन सा वन्डरफुल राज़ समाया हुआ है?
उत्तर:-
आधाकल्प है
भक्ति की डांस और आधाकल्प है ज्ञान की डांस। जब भक्ति की डांस होती है तो ज्ञान की
नहीं और जब ज्ञान की होती तो भक्ति की नहीं। आधाकल्प रावण की प्रालब्ध चलती और
आधाकल्प तुम बच्चे प्रालब्ध भोगते हो। यह गुह्य राज़ सीढ़ी के चित्र में समाया हुआ
है।
गीत:-
ओम् नमो शिवाए...
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) पुरुषार्थ कर सम्पूर्ण गुणवान बनना है। कर्म कोई भी हो लेकिन बाप की
याद में रहकर करना है। कोई भी विकर्म नहीं करना है।
2) यह पुराना कपड़ा (शरीर) जड़जड़ीभूत है, इससे ममत्व निकाल देना है। आत्मा को
सतोप्रधान बनाने का पूरा-पूरा पुरुषार्थ करना है।
वरदान:-
सदा
अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति करने वाले अटल अखण्ड स्वराज्य अधिकारी भव
जो बच्चे संगमयुग पर
अतीन्द्रिय सुख का वर्सा सदाकाल के लिए प्राप्त कर लेते हैं अर्थात् जिनका बाप के
विल पर पूरा अधिकार होता है वे विल पावर वाले होते हैं। उन्हें अटूट अटल अतीन्द्रिय
सुख की अनुभूति होती है। ऐसे वारिस अर्थात् सम्पूर्ण वर्से के अधिकारी ही भविष्य
में अटल-अखण्ड स्वराज्य का अधिकार प्राप्त करते हैं।
स्लोगन:-
जहाँ
मेरापन आता है वहाँ बुद्धि का फेरा हो जाता है।
मातेश्वरी जी के
अनमोल महावाक्य “चढ़ती कला और गिरती कला की मुख्य जड़ क्या है?''
बहुत मनुष्य यह
प्रश्न पूछते हैं कि जब इतना पुरुषार्थ कर जीवनमुक्ति पद को पाते हैं तो फिर वहाँ
क्या कारण बनता जो हम नीचे गिरते हैं? भल हम कहते हैं कि यह हार और जीत का खेल है,
इसमें चढ़ती कला और उतरती कला होने का भी कोई कारण जरूर है। जिस कारण के आधार पर यह
खेल चलता है, जैसे पुरुषार्थ से हम चढ़ रहे हैं वैसे गिरने का भी कारण जरुर है। अब
कारण भी कोई बड़ा नहीं है जरा सी भूल है जैसे परमात्मा कहता है मुझे याद करो तो मैं
तुमको मुक्ति जीवनमुक्ति पद दूँगा वैसे ही जब बॉडी कॉन्सेस हो परमात्मा को भूलते
हैं तो गिरते हैं। फिर वाम मार्ग में चले जाते हैं फिर 5 विकारों में फंसने से दु:ख
उठाते हैं तो यह हुआ अपना दोष, न कि रचता का दोष है। जो लोग कहते हैं दु:ख सुख
परमात्मा ही देता है यह कहना बिल्कुल रांग है। बाबा सुख रचता है न कि दु:ख रचता।
बाकी हम श्रेष्ठ कर्म से सुख उठाते हैं और भ्रष्ट कर्म से दु:ख भोगते हैं, बाकी
अच्छे कर्म का फल और बुरे कर्मों का दण्ड परमात्मा द्वारा अवश्य मिलता है। परन्तु
ऐसे नहीं कहेंगे कि सुख-दु:ख दोनों परमात्मा देता है, नहीं। परमात्मा तो चढ़ती कला
में हमारे साथ है, बाकी गिराने वाली माया है। कॉमन रीति में भी कोई साथ अथवा मदद
लेते हैं सुख के लिये। बाकी दु:ख उठाने के लिये कोई किसका साथ नहीं लेते। बाकी तो
जैसा-जैसा कर्म वैसा-वैसा फल की रिजल्ट। तो इस ड्रामा के अन्दर दु:ख-सुख का खेल अपने
कर्मों के ऊपर बना हुआ है, परन्तु तुच्छ बुद्धि मनुष्य इस राज़ को नहीं जानते। अच्छा
- ओम् शान्ति।
ये अव्यक्त इशारे
- सदा अचल, अडोल, एकरस स्थिति का अनुभव करो
समय प्रमाण अब सदा
अचल-अडोल सर्व खजानों से सम्पन्न रहो। थोड़ा भी डगमग हुए तो सर्व खजानों का अनुभव
नहीं होगा। बाप द्वारा मिले हुए खजानों को सदा कायम रखने का साधन है सदा अचल अडोल
रहना। अचल रहने से सदा ही खुशी की अनुभूति होती रहेगी। जैसे विनाशी धन, नाम-मान-शान,
कुर्सी आदि मिलती है तो खुशी होती है ना। यह तो अविनाशी खुशी है लेकिन यह खुशी उसे
रहेगी जो अचल अडोल, एकरस स्थिति में रहेंगे।