01-08-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - परचिंतन छोड़ अपना कल्याण करो, तुम सोने
जैसा बनकर औरों को रास्ता बताओ''
प्रश्नः-
अशरीरी बनने
का अभ्यास जो सदा करते रहते, उनकी मुख्य निशानी सुनाओ?
उत्तर:-
वे हठ से अपनी
कर्मेन्द्रियों को वश नहीं करते। लेकिन उनकी कर्मेन्द्रियाँ स्वत: शीतल हो जाती
हैं। हम आत्मा भाई-भाई हैं, यह स्मृति स्वत: रहती है। देह-अभिमान छूटता जाता है।
नाम रूप का नशा खत्म होता जाता है। दूसरों की याद नहीं आती है।
गीत:-
तू प्यार का
सागर है...
धारणा
के लिए मुख्य सार:-
1)
निश्चयबुद्धि बन जीते जी इस पुरानी दुनिया से अपना लंगर उठा लेना है। बाप के हर
फरमान को पालन कर अपना कल्याण करना है।
2) दूसरों का चिंतन
छोड़ अपनी बुद्धि को स्वच्छ सोने जैसा बनाना है। झरमुई-झगमुई में अपना समय नष्ट नहीं
करना है। योगबल से अपनी कर्मेन्द्रियों को शान्त, शीतल बनाना है।
वरदान:-
अपनी विजय वा
सफलता को निश्चित समझकर सदा निश्चिंत रहने वाले निश्चयबुद्धि भव
जो बच्चे सदा बाप
में, स्वयं के पार्ट में और ड्रामा की हर सेकण्ड की एक्ट में 100 प्रतिशत
निश्चयबुद्धि हैं उनकी विजय वा सफलता निश्चित है। निश्चित विजय होने के कारण वे सदा
निश्चिंत रहते हैं। उनके चेहरे से चिंता की कोई भी रेखा दिखाई नहीं देगी। उन्हें सदा
निश्चय रहता है कि यह कार्य वा यह संकल्प सिद्ध हुआ ही पड़ा है। उन्हें कभी किसी
बात में क्वेश्चन नहीं उठ सकता।
स्लोगन:-
सुनने-सुनाने
में भावना और भाव को बदल देना ही वायुमण्डल खराब करना है।
ये अव्यक्त इशारे -
अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो
सम्पूर्ण पवित्रता के
हिसाब से व्यर्थ संकल्प भी अपवित्रता का बीज है। व्यर्थ संकल्प चलना, मैजारिटी बच्चों
में अभी यह संस्कार रहा हुआ है। व्यर्थ संकल्प का आधार मन है, जो मनमनाभव होने नहीं
देता इसलिए श्रीमत रूपी लगाम टाइट कर व्यर्थ संकल्पों की अपवित्रता को खत्म करो।