04-06-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - तुम पारलौकिक बाप को यथार्थ रीति जानते हो इसलिए तुम्हें ही सच्चे प्रीत बुद्धि वा आस्तिक कहेंगे''

प्रश्नः-
बाप के किस कर्तव्य से सिद्ध होता है कि वह भक्तों का रक्षक है?

उत्तर:-
सब भक्तों को रावण की जेल से छुड़ाना, इनसालवेन्ट से सालवेन्ट बनाना, यह एक बाप का ही कर्तव्य है। जो पुराने भक्त हैं उन्हें ब्राह्मण बनाकर देवता बना देना - यही उनकी रक्षा है। भक्तों का रक्षक आया है - अपने सभी भक्तों को मुक्ति-जीवनमुक्ति देने।

गीत:-
भोलेनाथ से निराला...

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) श्रीमत पर चलकर श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ देवता बनना है। सारे विश्व की सच्ची-सच्ची रूहानी सेवा करनी है। आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना में बाप का पूरा मददगार बनना है।

2) आत्मा को सच्चा सोना बनाने के लिए एक बाप के सिवाए किसी भी देहधारी को याद नहीं करना है। पारलौकिक बाप से सच्ची-सच्ची प्रीत रखनी है।

वरदान:-

आत्मिक उन्नति के साधन द्वारा सर्व परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करने वाले अकालमूर्त भव

जैसे शरीर निर्वाह के लिए अनेक साधन अपनाते हो ऐसे आत्मिक उन्नति के भी साधन अपनाओ, इसके लिए सदा अकालमूर्त स्थिति में स्थिति होने का अभ्यास करो। जो स्वयं को अकालमूर्त (आत्मा) समझकर चलते हैं वह अकाले मृत्यु से, अकाल से, सर्व समस्याओं से बच जाते हैं। मानसिक चिंतायें, मानसिक परिस्थितियों को हटाने के लिए सिर्फ अपने पुराने शरीर के भान को मिटाते जाओ।

स्लोगन:-

कोई भी बात जो बार-बार फील करता है वह फाइनल में फेल हो जाता है।

मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य - “मनुष्य साक्षात्कार में कैसे जाते हैं?''

यह जो साक्षात्कार में जाना होता है तो इसकी फिलॉसाफी भी बहुत महीन है। यह अंत:वाहक शरीर से जाकर घूम आते हैं। जैसे कोई बाहर घूमने जाता है ना, तो ऐसे नहीं घूमने गया तो मरा, वो घूम कर फिर वापस लौटकर आयेगा ना। तो यह भी आत्मा इस बॉडी से निकल अन्त:वाहक शरीर से सैर करने जाती है, थोड़े समय के लिये इनकी आत्मा उड़ता पंछी है, यह भी परमात्मा का काम है जो उनकी रस्सी को खैंच दिव्य दृष्टि से उनको साक्षात्कार कराता है। जैसे रात को हम जब शरीर से न्यारी आत्मा हो सुख-पथ अथवा स्वप्न की अवस्था में चले जाते हैं, तो उसी समय शरीर शान्त है, तो देह और देह के धर्म भूल जाते परन्तु ऐसे नहीं कोई शरीर मर गया फिर जब जागृत में आता है, तो उस रात के सपने की अवस्था का वर्णन कर सुनाते हैं। वैसे परमात्मा के साथ योग लगाने से परमात्मा फिर दिव्य दृष्टि से आत्मा को सैर कराते हैं। फिर जब ध्यान से उठते हैं तो वो देखा हुआ साक्षात्कार, फिर वर्णन कर सुनाते हैं कि हम यह देखकर आये। तो वह स्वप्न रजोगुण, तमोगुण भी होता है, यह ध्यान फिर सतोगुण अवस्था है। तो ध्यान में कोई शरीर मरता नहीं है, मगर शरीर की भासना गुम हो जाती है। जैसे क्लोरोफॉर्म देने से शरीर की सुध-बुध भूल जाती है, देखो, डॉक्टर जब कोई अंग को डेड करते हैं तो इंजेक्शन लगाकर डेड कर देते हैं परन्तु और इन्द्रियां तो चलती हैं, तो ध्यान भी इसी तरह से है कि आत्मा कोई उड़कर सैर कर आती है परन्तु शरीर मर नहीं जाता, अब यह रस्सी खींचने की स्मृति भी परमात्मा में है, न कि मनुष्य आत्मा में। अच्छा, ओम् शान्ति।

ये अव्यक्त इशारे - सदा हर्षित रहने के लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ, सहनशील बनो।

सदा हर्षित रहने वालों का यादगार विष्णु के रूप में दिखाया है। विष्णु क्षीरसागर में आराम से लेटा हुआ ज्ञान का सिमरण कर हर्षित हो रहा है। तो हर्षित रहने का साधन है ज्ञान का सिमरण। जो जितना ज्ञान का सिमरण करते हैं वह उतना ही हर्षित रहते हैं। कोई भी परिस्थिति उनकी हिम्मत, उमंग-हुल्लास को कम नहीं कर सकती। वे सहनशीलता की शक्ति से हर परिस्थिति को सहज पार कर लेते हैं।