10-09-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - बाप आये हैं तुम्हें पुजारी से पूज्य बनाने, पूज्य से पुजारी और पुजारी से पूज्य बनने की पूरी कहानी तुम बच्चे जानते हो''

प्रश्नः-
कौन सी बात दुनिया वालों के लिए असम्भव लगती और तुम सहज उसे अपने जीवन में धारण करते हो?

उत्तर:-
दुनिया वाले समझते हैं कि गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र रहना - यह तो बिल्कुल असम्भव है और तुम सहज धारण कर लेते, क्योंकि जानते हो इससे स्वर्ग की बादशाही मिलती है। तो यह बहुत सस्ता सौदा हुआ ना।

गीत:-
यह कौन आज आया सवेरे...

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) इस कल्याणकारी युग में एक बाप से ही सच्ची सत्य नारायण की कथा, अमरकथा सुननी है। बाकी जो कुछ सुना है उसे भूल जाना है।

2) सतयुगी बादशाही लेने के लिए इस एक जन्म में पवित्र रहना है। फरिश्ता बनने का पुरुषार्थ करना है।

वरदान:-
हर संकल्प, समय, शब्द और कर्म द्वारा ईश्वरीय सेवा करने वाले सम्पूर्ण वफादार भव

सम्पूर्ण वफादार उन्हें कहा जाता है जो हर वस्तु की पूरी-पूरी सम्भाल करते हैं। कोई भी चीज़ व्यर्थ नहीं जाने देते। जब से जन्म हुआ तब से संकल्प, समय और कर्म सब ईश्वरीय सेवा अर्थ हो। यदि ईश्वरीय सेवा के बजाए कहाँ भी संकल्प वा समय जाता है, व्यर्थ बोल निकलते हैं या तन द्वारा व्यर्थ कार्य होता है तो उनको सम्पूर्ण वफादार नहीं कहेंगे। ऐसे नहीं कि एक सेकण्ड वा एक पैसा व्यर्थ गया - तो क्या बड़ी बात है। नहीं। सम्पूर्ण वफादार अर्थात् सब कुछ सफल करने वाले।

स्लोगन:-
श्रीमत को यथार्थ समझकर उस पर कदम-कदम चलने में ही सफलता समाई हुई है।

मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य “राजऋषि सतयुगी होते हैं''

लोग यह जो कहते हैं द्वापर में राजऋषि थे, जिन्होंने बैठ यह वेद शास्त्र रचे क्योंकि वो त्रिकालदर्शी थे। अब वास्तव में राजऋषि हम सतयुग में ही कह सकते हैं क्योंकि वहाँ विकारों को पूरा जीते हुए हैं अर्थात् कमल के फूल समान जीवनमुक्त अवस्था में रहते राजाई चलाते हैं। बाकी यह जो द्वापर में परमात्मा को प्राप्त करने के लिये तप करने वाले ऋषि हैं जिन्होंने वेद शास्त्र रचे हैं सतयुग में तो वेद शास्त्रों की जरुरत ही नहीं रहती, न हम उन्हों को त्रिकालदर्शी कह सकते हैं। जब हम ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को त्रिकालदर्शी नहीं कह सकते हैं तो फिर यह द्वापर युग वाले रजोगुण समय के ऋषि, मुनि कैसे त्रिकालदर्शी बन सकते हैं। त्रिकालदर्शी, त्रिमूर्ति, त्रिनेत्री सिर्फ एक परमात्मा शिव को कह सकते हैं, जो स्वयं इस कल्प के अन्त में आए सारी रचना का अन्त दे देते हैं। वहाँ सतयुग में प्रालब्ध भोगनी है, वहाँ यह ज्ञान नहीं रहता कि हम ब्रह्मावंशी ब्राह्मण ही सिर्फ मास्टर त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी बनते हैं, बाकी सारे कल्प के अन्दर कोई को भी ज्ञान नहीं मिल सकता है, न देवताओं को न मनुष्यों को त्रिकालदर्शी कह सकते हैं। अच्छा, ओम् शान्ति।

अव्यक्त इशारे - अब अपने दाता स्वरूप को प्रत्यक्ष करो

कभी भी अपने पुण्य के बदले प्रशंसा लेने की कामना भी नहीं रखना, यह हद की प्रशंसा को स्वीकार करना सदाकाल की प्राप्ति से वंचित होना है इसलिए सदा देने में सागर के समान सम्पन्न बनो। आपका हर बोल औरों को खुशी में, बाप के स्नेह में, अतीन्द्रिय सुख में रूहानी आनन्दमय जीवन का अनुभव कराये और हर कर्म सर्व आत्माओं के प्रति सदा सहयोग की प्राप्ति कराने वाला हो।