11-06-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - पूरा वर्सा लेने के लिए एक बाप से पूरी प्रीत रखो, तुम्हारी प्रीत किसी भी देहधारी से नहीं होनी चाहिए''

प्रश्नः-
जो अपने दैवी सम्प्रदाय के होंगे उनके सामने कौन से अक्षर घूमते रहेंगे?

उत्तर:-
जब तुम उन्हें बतायेंगे कि बाप को याद करने से विकर्म विनाश होते हैं और देवी-देवता धर्म की स्थापना होती है तो यह अक्षर उनके सामने घूमते रहेंगे। उनकी बुद्धि में आयेगा हमें देवता बनना है इसलिए हमारा खान-पान शुद्ध होना चाहिए।

गीत:-
भोलेनाथ से निराला....

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) ब्राह्मण से देवता बनने के लिए जो भी छी-छी आदतें हैं उन सबको छोड़ना है। शूद्रों को ब्राह्मण धर्म में कनवर्ट कर देवता बनाने के लिए ईश्वरीय मिशन के कार्य में सहयोगी बनना है। शराब, सिगरेट या जो भी गन्दी आदतें है वह निकाल देनी हैं।

2) इस विनाश काल के समय में एक बाप से सच्ची प्रीत रखनी है। पुराना मकान टूटने वाला है इसलिए इससे दिल निकाल नये से लगानी है।

वरदान:-
श्रेष्ठ कर्म द्वारा सिमरण योग्य बनने वाले योगयुक्त, युक्तियुक्त भव

आपका एक-एक कर्म जितना श्रेष्ठ होगा उतना ही श्रेष्ठ आत्माओं में सिमरण किये जायेंगे। भक्ति में नाम का सिमरण करते हैं, लेकिन यहाँ जो श्रेष्ठ आत्मायें हैं उनके गुणों और कर्मो को मिसाल बनाने के लिए सिमरण करते हैं। तो आप श्रेष्ठ कर्मो के आधार पर सिमरण योग्य बनते जायेंगे, इसके लिए योगयुक्त बनो। योगयुक्त बनने से हर संकल्प, शब्द वा कर्म युक्तियुक्त अवश्य होगा, उनसे अयुक्त कर्म वा संकल्प हो ही नहीं सकता - यह भी कनेक्शन है।

स्लोगन:-
निमित्त और निर्माणचित्त - यही सच्चे सेवाधारी के लक्षण हैं।

ये अव्यक्त इशारे - सदा हर्षित रहने के लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ, सहनशील बनो।

सरलचित नेचर होगी तो हर्षित रहने के साथ नयनों से, मुख से और चलन से मधुरता प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देगी। कभी मुख से कटुवचन नहीं निकलेंगे। उनका दिल, दिमाग, बोल सब एक समान होगा। दिल में एक, बोल में दूसरा - यह सरलता की निशानी नहीं है। सरल स्वभाव वाले सदा निर्माणचित, निरहंकारी, निर-स्वार्थी होते हैं।