11-07-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - तुम्हें अपना चिंतन करना है, दूसरे का नहीं
क्योंकि ड्रामा अनुसार जो करेगा वह पायेगा''
प्रश्नः-
त्रिकालदर्शी
बनने से आत्मा को कौन सी स्मृति आई है?
उत्तर:-
आत्मा को
स्मृति आई - हम असुल मूलवतन के निवासी इस ड्रामा में पार्ट बजाने आये हैं, हमने
मुख्य एक्टर बन 84 जन्मों का पार्ट बजाया। अभी बाप के सम्मुख हैं फिर साथ में घर
जायेंगे। पावन बनकर घर जाना है फिर सुखधाम में आना है। यह सारा खेल भारत पर ही बना
हुआ है। यह सारी स्मृति त्रिकालदर्शी बनने से आ गई।
गीत:-
मरना तेरी गली
में...
धारणा
के लिए मुख्य सार:-
1)
इस बेहद के खेल को साक्षी हो देखना है। कोई से भी डरना नहीं है। निर्भय बनने के लिए
“मैं आत्मा हूँ'' यह पाठ पक्का करना है।
2) अपनी जांच करके
स्वयं की परीक्षा लेनी है कि कोई भी कर्मेन्द्रिय चलायमान तो नहीं होती है? काम
विकार पर विजय पाई है? देही-अभिमानी कहाँ तक बने हैं?
वरदान:-
एक बाप की
स्मृति से सच्चे सुहाग का अनुभव करने वाले भाग्यवान आत्मा भव
जो किसी भी आत्मा के
बोल सुनते हुए नहीं सुनते, किसी अन्य आत्मा की स्मृति संकल्प वा स्वप्न में भी नहीं
लाते अर्थात् किसी भी देहधारी के झुकाव में नहीं आते, एक बाप दूसरा न कोई इस स्मृति
में रहते हैं उन्हें अविनाशी सुहाग का तिलक लग जाता है। ऐसे सच्चे सुहाग वाले ही
भाग्यवान हैं।
स्लोगन:-
अपनी श्रेष्ठ
स्थिति बनानी है तो अन्तर्मुखी बन फिर बाह्यमुखता में आओ।
ये अव्यक्त इशारे -
ज्वालास्वरूप स्थिति में रह शक्तिशाली याद का अनुभव करो
जैसे अग्नि में कोई
भी चीज़ डालो तो नाम, रूप, गुण सब बदल जाता है, ऐसे जब बाप के याद के लगन की अग्नि
में पड़ते हो तो परिवर्तन हो जाते हो। मनुष्य से ब्राह्मण बन जाते, फिर ब्राह्मण से
फरिश्ता सो देवता बन जाते। लग्न की अग्नि से ऐसा परिवर्तन होता है जो अपनापन कुछ भी
नहीं रहता, इसलिए याद को ही ज्वाला रूप कहा है।