14-09-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - प्राण बचाने वाला प्राणेश्वर बाप आया है, तुम बच्चों को ज्ञान की मीठी मुरली सुनाकर प्राण बचाने''

प्रश्नः-
कौन सा निश्चय तकदीरवान बच्चों को ही होता है?

उत्तर:-
हमारी श्रेष्ठ तकदीर बनाने स्वयं बाप आये हैं। बाप से हमें भक्ति का फल मिल रहा है। माया ने जो पंख काट दिये हैं - वह पंख देने, अपने साथ वापिस ले जाने के लिए बाप आये हैं। यह निश्चय तकदीरवान बच्चों को ही होता है।

गीत:-
यह कौन आज आया सवेरे......

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) ज्ञान और योग से बुद्धि को पारस बनाना है। कितना भी बीमार हो, तकलीफ हो, उसमें भी एक बाप की याद रहे।

2) अपनी ऊंची तकदीर बनाने के लिए पूरा-पूरा निश्चयबुद्धि बनना है। बुद्धियोग अपने स्वीट साइलेन्स होम में लगाना है।

वरदान:-
त्रिकालदर्शी बन व्यर्थ संकल्प व संस्कारों का परिवर्तन करने वाले विश्व कल्याणकारी भव

जब मास्टर त्रिकालदर्शी बन संकल्प को कर्म में लायेंगे, तो कोई भी कर्म व्यर्थ नहीं होगा। इस व्यर्थ को बदलकर समर्थ संकल्प और समर्थ कार्य करना - इसको कहते हैं सम्पूर्ण स्टेज। सिर्फ अपने व्यर्थ संकल्पों वा विकर्मो को भस्म नहीं करना है लेकिन शक्ति रूप बन सारे विश्व के विकर्मो का बोझ हल्का करने व अनेक आत्माओं के व्यर्थ संकल्पों को मिटाने की मशीनरी तेज करो तब कहेंगे विश्व कल्याणकारी।

स्लोगन:-
नष्टोमोहा बनना है तो सेवा अर्थ स्नेह रखो, स्वार्थ से नहीं।

मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य “ज्ञान और योग का कॉन्ट्रास्ट''

योग और ज्ञान दो शब्द हैं, योग कहा जाता है परमात्मा की याद को। और कोई की याद के सम्बन्ध में योग शब्द नहीं आता। गुरु लोग जो भी योग सिखलाते हैं, वह भी परमात्मा की तरफ ही लगाते हैं, परन्तु उन्हों को सिर्फ परमात्मा का पूरा परिचय नहीं है इसलिए योग की पूरी सिद्धि नहीं मिलती। योग और ज्ञान दोनों बल हैं, जिस दोनों के पुरुषार्थ से माइट मिलती है और हम विकर्माजीत बन श्रेष्ठ जीवन बनाते हैं। योग अक्षर तो सभी कहते हैं परन्तु जिससे योग लगाया जाता है उनका पहले परिचय चाहिए। अब यह परमात्मा का परिचय भी हमें परमात्मा द्वारा ही मिलता है, उस परिचय से योग लगाने से पूर्ण सिद्धि मिलती है। योग से हम पास्ट विकर्मों का बोझा भस्म करते हैं और ज्ञान से भी पता पड़ता है कि आगे के लिये हमको कौन-सा कर्म करना है और क्यों? जीवन की जड़ हैं संस्कार, आत्मा भी अनादि संस्कारों से बनी हुई है परन्तु कर्म से वो संस्कार बदलते रहते हैं। योग और ज्ञान से आत्मा में श्रेष्ठता आती है और जीवन में बल आता है, परन्तु यह दोनों चीज़ मिलती हैं परमात्मा से। कर्मबन्धन से छुड़ाने का रास्ता भी हमें परमात्मा से प्राप्त होता है। हमने जो विकर्मों से कर्मबन्धन बनाये हैं उनसे मुक्ति हो और आगे के लिये हमारे कर्म विकर्म न बनें तो इन दोनों का बल परमात्मा के सिवाए कोई दे नहीं सकता। योग और ज्ञान दोनों ही चीज़ परमात्मा ले आता है, योग अग्नि से किये हुए विकर्म भस्म कराते हैं और ज्ञान से भविष्य के लिये श्रेष्ठ कर्म सिखलाते हैं, जिससे कर्म, अकर्म होता है तभी तो परमात्मा ने कहा है कि इस कर्म-अकर्म-विकर्म की गति बहुत गहन है। अब तो हम आत्माओं को डायरेक्ट परमात्मा का बल चाहिए, शास्त्रों द्वारा यह योग और ज्ञान का बल नहीं मिल सकता परन्तु उस सर्वशक्तिवान बलवान द्वारा ही बल मिलता है। अब हमको अपनी जीवन की जड़ (संस्कार) ऐसे बनाने हैं जिससे जीवन में सुख मिले। तो परमात्मा आए जीवन की जड़ में शुद्ध संस्कारों का बीज़ डालता है, जिन शुद्ध संस्कारों के आधार पर हम आधाकल्प जीवनमुक्त बनेंगे। अच्छा - ओम् शान्ति।

ये अव्यक्त इशारे - अब अपने दाता वरूप को प्रत्यक्ष करो

आप पूर्वज, पूज्य आत्माओं को अनेक आत्मायें शान्ति देवा, शक्ति देवा कह याद कर रही हैं। ऐसे समय पर हे शान्ति देवा आत्मायें, मास्टर शान्ति के सागर, मास्टर शान्ति के सूर्य अपनी शान्ति की किरणें, शान्ति की लहरें दाता के बच्चे देवा बन सर्व को देते रहो। ऐसी सेवा करने के विशेष अभ्यासी बनो।