18-08-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - सुनी सुनाई बातों पर विश्वास नहीं करो, अगर कोई उल्टी सुल्टी बातें सुनाये तो एक कान से सुन दूसरे से निकाल दो''

प्रश्नः-
जो बच्चे ज्ञान की खुशी में रहते हैं उनकी निशानी क्या होगी?

उत्तर:-
वे पुराने कर्मभोग का हिसाब-किताब उस खुशी में मर्ज करते जायेंगे। ज्ञान की खुशी में दु:ख दर्द, गम की दुनिया ही भूल जाती है। बुद्धि में रहता अब तो हम खुशी की दुनिया में जा रहे हैं। रावण ने श्रापित कर दु:खी किया, अब बाप आये हैं उस दु:ख की, गम की दुनिया से निकाल खुशी की दुनिया में ले जाने।

गीत:-
तुम्हें पाके हमने....

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) श्रीमत पर अपना और दूसरों का कल्याण करना है। कोई कुछ झूठी बात सुनाये तो सुनी-अनसुनी कर देना है। उस पर बिगड़ना नहीं है।

2) कभी भी देवता बनने वाले ब्राह्मण कुल भूषणों का नाम बदनाम न हो - इसका ध्यान रखना है। कोई उल्टा कर्म कभी नहीं करना है। पिछले हिसाब-किताब चुक्तू करने हैं।

वरदान:-
नशे और निशाने की स्मृति से सर्व कर्मेन्द्रियों को आर्डर प्रमाण चलाने वाले ताज व तख्तनशीन भव

संगमयुग पर बापदादा द्वारा सभी बच्चों को ताज और तख्त प्राप्त होता है। प्योरिटी का भी ताज है तो जिम्मेवारियों का भी ताज है, अकाल तख्त भी है तो दिलतख्तनशीन भी हो। जब ऐसे डबल ताज और तख्तनशीन बनते हो तो नशा और निशाना स्वत: याद रहता है। फिर यह कर्मेन्द्रियां जी हजूर करती हैं। जो ताज व तख्त छोड़ देते हैं उनका आर्डर कोई भी कारोबारी नहीं मानते।

स्लोगन:-
कमजोर संकल्प ही प्रसन्नचित के बजाए प्रश्नचित बना देते हैं।

ये अव्यक्त इशारे - अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो

ईश्वरीय सेवा का बड़े-से-बड़ा पुण्य है - पवित्रता का दान देना। पवित्र बनना और बनाना ही पुण्य आत्मा बनना है क्योंकि किसी आत्मा को आत्म-घात महा पाप से छुड़ाते हो। अपवित्रता आत्म-घात है। पवित्रता जीय-दान है।