19-10-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - अब विदेही बनने का अभ्यास करो, अपनी इस
विनाशी देह से प्यार निकाल एक शिव-बाबा को प्यार करो''
प्रश्नः-
इस बेहद की
पुरानी दुनिया से जिन्हें वैराग्य आ चुका है उनकी निशानी क्या होगी?
उत्तर:-
वह इन आंखों
से जो कुछ देखते हैं - वह देखते हुए भी जैसे नहीं देखेंगे। उनकी बुद्धि में यह होगा
कि यह सब खत्म होना है। यह सब मरे पड़े हैं। हमको तो शान्तिधाम, सुखधाम में जाना
है। उनका ममत्व मिटता जायेगा। योग में रहकर किससे बात करेंगे तो उन्हें भी कशिश होगी।
ज्ञान का नशा चढ़ा हुआ होगा।
गीत:-
ओम् नमो शिवाए...
धारणा
के लिए मुख्य सार:-
1)
ज्ञान मार्ग में अपनी अवस्था बहुत मजबूत बनानी है। विदेही बनना है। एक बाप से ही
सच्ची-सच्ची प्रीत रखनी है।
2) ड्रामा की भावी पर
अडोल रहना है। ड्रामा में जो हुआ सो राइट। कभी डगमग नहीं होना है, किसी भी बात में
संशय नहीं लाना है।
वरदान:-
कमजोरियों को
फुलस्टाप देकर अपने सम्पन्न स्वरूप को प्रख्यात करने वाले साक्षात्कारमूर्त भव
विश्व आपके कल्प पहले
वाले सम्पन्न स्वरूप, पूज्य स्वरूप का सिमरण कर रही है इसलिए अब अपने सम्पन्न
स्वरूप को प्रैक्टिकल में प्रख्यात करो। बीती हुई कमजोरियों को फुलस्टाप लगाओ, दृढ़
संकल्प द्वारा पुराने संस्कार-स्वभाव को समाप्त करो, दूसरों की कमजोरी की नकल मत करो,
अवगुण धारण करने वाली बुद्धि का नाश करो, दिव्य गुण धारण करने वाली सतोप्रधान बुद्धि
धारण करो तब साक्षात्कार मूर्त बनेंगे।
स्लोगन:-
अपने अनादि और
आदि गुणों को स्मृति में रख उन्हें स्वरूप में लाओ।
मातेश्वरी जी के
अनमोल महावाक्य
निराकार परमात्मा का
रिजर्व तन ब्रह्मा तन है
यह तो अपने को पूरा
निश्चय है कि परमात्मा अपने साकार ब्रह्मा तन द्वारा आकर पढ़ा रहे हैं, इस प्वॉइन्ट
पर बहुत जिज्ञासू प्रश्न पूछते हैं कि अमृतवेले समय निराकार परमात्मा जब अपने साकार
तन में प्रवेश होते हैं तो उसी समय शरीर में क्या चेंज होती है? वो पूछते हैं क्या
तुम उस समय बैठ उनको देखते हो कि कैसे परमात्मा आता है? अब इस पर समझाया जाता है
परमात्मा की प्रवेशता होने समय ऐसे नहीं कि उस शरीर के कोई नयन, चयन बदली हो जाते
हैं, नहीं। परन्तु हम जब ध्यान में जाते हैं तब नयन, चयन बदली हो जाता है परन्तु इस
साकार ब्रह्मा का पार्ट ही गुप्त है। जब परमात्मा इसके तन में आता है तो कोई को भी
पता नहीं चलता, उसका यह तन रिजर्व किया हुआ है इसलिए सेकेण्ड में आता है, सेकेण्ड
में जाता है, अब इस राज़ को समझना। बाकी ऐसे नहीं कोई प्वॉइन्ट समझ में न आवे तो इस
पढ़ाई का कोर्स छोड़ देना है। पढ़ाई तो दिन प्रतिदिन गुह्य और क्लियर होती जाती है।
सारा कोर्स एकदम तो नहीं पढ़ सकेंगे ना, वैसे आपको समझाया जाता है। और जो भी धर्म
पितायें आते हैं उन्हों में भी अपनी अपनी पवित्र आत्मा आए अपना पार्ट बजाती है फिर
उन आत्माओं को सुख दु:ख के खेल में आना है, वो वापस नहीं जाते परन्तु जब निराकार
सुप्रीम सोल आते हैं तो वो सुख दु:ख से न्यारे हैं, तो वो सिर्फ अपना पार्ट बजाए
फिर चले जाते हैं। तो इस ही प्वॉइन्ट को हमें बुद्धि से समझना है।
आत्मा और परमात्मा
में गुणों और ताकत का फर्क
आत्मा और परमात्मा का
अन्तर (भेद) इस पर समझाया जाता है कि आत्मा और परमात्मा का रूप एक जैसा ज्योति रूप
है। आत्मा और परमात्मा की आत्मा का साइज एक ही रीति में है, बाकी आत्मा और परमात्मा
में सिर्फ गुणों की ताकत का फर्क अवश्य है। अब यह जो इतने गुण हैं वो सारी महिमा
परमात्मा की है। परमात्मा दु:ख सुख से न्यारा है, सर्वशक्तिवान है, उनकी ही सारी
शक्ति काम कर रही है। बाकी मनुष्य आत्मा की कोई शक्ति नहीं चल सकती है। परमात्मा का
ही सारा पार्ट चलता है, भल परमात्मा पार्ट में भी आता है, तो भी खुद न्यारा रहता
है। लेकिन आत्मा पार्ट में आते भी पार्टधारी के रूप में आ जाती है, परमात्मा पार्ट
में आते भी कर्मबन्धन से न्यारा है। आत्मा पार्ट में आते भी कर्मबन्धन के वश हो जाती
है, यह है आत्मा और परमात्मा में अन्तर, भेद। अच्छा। ओम् शान्ति।
ये अव्यक्त इशारे -
परोपकार की भावना से सम्पन्न बन अपकारी पर भी उपकार करो
कोई गाली भी दे, झूठा
इल्ज़ाम भी लगाये, लेकिन आपको क्रोध न आये। अपकारी के ऊपर उपकार करना, यही आप
ब्राह्मणों का कर्म है। वह गाली दे आप गले लगाओ, यही है कमाल। इसको कहा जाता है
परिवर्तन। गले लगाने वाले को गले लगाना, यह कोई बड़ी बात नहीं लेकिन निन्दा करने
वाले को सच्चा मित्र मन से मानो, तब कहेंगे उपकार करने वाले।