21-05-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - श्रीमत पर
चलकर सबको सुख दो, आसुरी मत पर दु:ख देते आये, अब सुख दो, सुख लो''
प्रश्नः-
बुद्धिवान
बच्चे किस राज़ को समझने के कारण ऊंच पद पाने का पुरुषार्थ करते हैं?
उत्तर:-
वे समझते हैं
कि यह दु:ख और सुख, हार और जीत का खेल है। अभी आधाकल्प सुख का खेल चलने वाला है। वहाँ
किसी भी प्रकार का दु:ख नहीं होगा। अब नई राजधानी आने वाली है, उसके लिए बाप अपना
परमधाम छोड़कर हम बच्चों को पढ़ाने आये हैं, अब पुरुषार्थ कर ऊंच पद लेना ही है।
गीत:-
बदल जाये
दुनिया न बदलेंगे हम...
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) शिवबाबा को विकारों का दान देकर फिर कभी वापस नहीं लेना है।
देह-अभिमान के भूत से बचना है। इस भूत से सब भूत आ जाते हैं इसलिए आत्म-अभिमानी बनने
का अभ्यास करना है।
2) ध्यान दीदार की आश नहीं रखनी है। एम-आब्जेक्ट को सामने रख पुरुषार्थ करना है।
श्रीमत पर सबको सुख देना है।
वरदान:-
करावनहार की
स्मृति से सेवा में सदा निर्माण का कार्य करने वाले कर्मयोगी भव
कोई भी कर्म, कर्मयोगी की
स्टेज में परिवर्तन करो, सिर्फ कर्म करने वाले नहीं लेकिन कर्मयोगी हैं। कर्म
अर्थात् व्यवहार और योग अर्थात् परमार्थ दोनों का बैलेन्स हो। शरीर निर्वाह के पीछे
आत्मा का निर्वाह भूल न जाए। जो भी कर्म करो वह ईश्वरीय सेवा अर्थ हो। इसके लिए
सेवाओं में निमित्त मात्र का मंत्र वा करनहार की स्मृति का संकल्प सदा याद रहे।
करावनहार भूले नहीं तो सेवा में निर्माण ही निर्माण करते रहेंगे।
स्लोगन:-
सेवा व
सम्बन्ध-सम्पर्क में विघ्न पड़ने का कारण है पुराने संस्कार, उन संस्कारों से
वैराग्य हो।
ये अव्यक्त इशारे
- सदा अचल, अडोल, एकरस स्थिति का अनुभव करो
सभी से श्रेष्ठ
तख्त बापदादा के दिल तख्तनशीन बनना है। लेकिन इस तख्त पर बैठने के लिए पहले अचल,
अड़ोल, एकरस स्थिति का तख्त चाहिए। एकरस स्थिति के तख्त पर तब स्थित रह सकेंगे जब
अकाल तख्त नशीन बनने का अभ्यास होगा। जैसे वह तपस्वी सदैव आसन पर बैठते हैं, ऐसे आप
अपनी एकरस आत्मा की स्थिति के आसन पर विराजमान रहो। इस आसन को नहीं छोड़ो तब
सिंहासन मिलेगा।