29-04-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - पतित जगत से नाता तोड़ एक बाप से बुद्धियोग लगाओ तो माया से हार नहीं हो सकती''

प्रश्नः-
समर्थ बाप साथ होते हुए भी यज्ञ में अनेक विघ्न क्यों पड़ते हैं? कारण क्या है?

उत्तर:-
यह विघ्न तो ड्रामा अनुसार पड़ने ही हैं क्योंकि जब यज्ञ में असुरों के विघ्न पड़ें तब तो पाप का घड़ा भरे। इसमें बाप कुछ नहीं कर सकते, यह तो ड्रामा में नूँध है। विघ्न पड़ने ही हैं लेकिन विघ्नों से तुम्हें घबराना नहीं है।

गीत:-
कौन है माता, कौन पिता है....

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) माया की बॉक्सिंग में कभी भी हार न हो - इसका ध्यान रखना है। कल्प पहले की स्मृति से अपनी अवस्था को जमाना है। खुशी और शान्ति में रहना है।

2) अपना भला करने के लिए श्रीमत पर चलना है। इस पुरानी दुनिया से नाता तोड़ देना है। माया के तूफान से बचने के लिए चित्रों को सामने रख बाप और वर्से को याद करना है।

वरदान:-
मनन द्वारा बाप की प्रापर्टी को अपनी प्रापर्टी बनाने वाले दिव्य बुद्धिवान भव

बाप द्वारा जो भी खजाना मिलता है, उसे मनन करो तो अन्दर समाता जायेगा। प्रापर्टी तो सबको एक जैसी मिली हुई है लेकिन जो मनन करके उसे अपना बनाते हैं, उन्हें उसका नशा और खुशी रहती है इसलिए कहा जाता है - अपनी घोट तो नशा चढ़े। जो मनन की मस्ती में सदा मस्त रहते हैं उन्हें दुनिया की कोई भी चीज़, उलझन आकर्षित नहीं कर सकती। उन्हें दिव्य बुद्धि का वरदान स्वत: मिल जाता है।

स्लोगन:-
मन की उलझन को समाप्त करने के लिए निर्णय शक्ति को बढ़ाओ।

ये अव्यक्त इशारे - महान बनने के लिए मधुरता और नम्रता का गुण धारण करो

ऐसे नहीं समझो कि हम तो सदैव झुकते ही रहते हैं लेकिन हमारा कोई मान नहीं, जो झुकते नहीं व झूठ बोलते हैं उनका ही मान है - नहीं। यह अल्पकाल का है, लेकिन आप दूरादेशी बुद्धि रखो, यहाँ जितनों के आगे झुकेंगे अर्थात् नम्रता के गुण को धारण करेंगे, तो सारा कल्प ही सर्व आत्मायें आगे आगे नमन करेंगी। सतयुग त्रेता में राजा के रिगार्ड में काँध से नहीं लेकिन मन से झुकेंगे और द्वापर कलियुग में काँध झुकायेंगे।