29-09-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - बेहद का बाप इस बेहद की महफिल में गरीब
बच्चों को गोद लेने के लिए आये हैं, उन्हें देवताओं की महफिल में आने की जरूरत नहीं''
प्रश्नः-
बच्चों को कौन
सा दिन बड़े ही धूमधाम से मनाना चाहिए?
उत्तर:-
जिस दिन मरजीवा
जन्म हुआ, बाप में निश्चय हुआ... वह दिन बड़े ही धूमधाम से मनाना चाहिए। वही
तुम्हारे लिए जन्माष्टमी है। अगर अपना मरजीवा जन्म दिन मनायेंगे तो बुद्धि में याद
रहेगा कि हमने पुरानी दुनिया से किनारा कर लिया। हम बाबा के बन गये अर्थात् वर्से
के अधिकारी बन गये।
गीत:-
महफिल में जल
उठी शमा...
धारणा
के लिए मुख्य सार:-
1)
हर बात के लिए पुरुषार्थ जरूर करना है। ड्रामा कहकर बैठ नहीं जाना है। कर्मयोगी,
राजयोगी बनना है। कर्म संन्यासी, हठयोगी नहीं।
2) बिगर सजा खाये बाप
के साथ घर चलने के लिए याद में रहकर आत्मा को सतोप्रधान बनाना है। सांवरे से गोरा
बनना है।
वरदान:-
सर्व रूपों
से, सर्व सम्बन्धों से अपना सब कुछ बाप के आगे अर्पण करने वाले सच्चे स्नेही भव
जिससे अति स्नेह होता
है, तो उस स्नेह के लिए सभी को किनारे कर सब कुछ उनके आगे अर्पण कर देते हैं, जैसे
बाप का बच्चों से स्नेह है इसलिए सदाकाल के सुखों की प्राप्ति स्नेही बच्चों को
कराते हैं, बाकी सबको मुक्तिधाम में बिठा देते हैं, ऐसे बच्चों के स्नेह का सबूत है
सर्व रूपों, सर्व संबंधों से अपना सब कुछ बाप के आगे अर्पण करना। जहाँ स्नेह है वहाँ
योग है और योग है तो सहयोग है। एक भी खजाने को मनमत से व्यर्थ नहीं गंवा सकते।
स्लोगन:-
साकार कर्म
में ब्रह्मा बाप को और अशरीरी बनने में निराकार बाप को फालो करो।
ये अव्यक्त इशारे -
अब अपने दाता स्वरूप को प्रत्यक्ष करो
आप बच्चों के पास
अनुभूतियों का खजाना सम्पन्न है, तो आप सम्पन्न मूर्तियां मास्टर दाता बन सबको
अनुभूति कराते चलो। दाता अर्थात् सेवाधारी। दाता देने के बिना रह नहीं सकते। वे अपने
रहमदिल के गुण से किसी को हिम्मत देंगे तो किसी निर्बल आत्मा को बल देंगे। वह
मास्टर सुखदाता होंगे।