30-04-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - तुम्हारी यह
वन्डरफुल युनिवर्सिटी है, जिसमें बिगड़ी को बनाने वाला भोलानाथ बाप टीचर बनकर तुम्हें
पढ़ाते हैं''
प्रश्नः-
इस कयामत के
समय में तुम बच्चे सभी को कौन सा लक्ष्य देते हो?
उत्तर:-
हे आत्मायें
अब पावन बनो, पावन बनने बिगर वापिस जा नहीं सकते। आधाकल्प का जो रोग लगा हुआ है,
उससे मुक्त होने के लिए तुम सबको 7 रोज़ भट्ठी में बिठाते हो। पतितों के संग से दूर
रहे, कोई भी याद न आये तब कुछ बुद्धि में ज्ञान की धारणा हो।
गीत:-
तूने रात
गँवाई...
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) किसी भी बात की डिबेट में अपना टाइम वेस्ट नहीं करना है। व्यर्थ की
बातों में बुद्धि जास्ती न जाये। जितना हो सके याद की यात्रा से विकर्म विनाश करने
हैं। आत्म-अभिमानी रहने की आदत डालनी है।
2) इस पुरानी दुनिया से अपना मुँह फेर लेना है। शान्तिधाम और सुखधाम को याद करना
है। नया मकान बन रहा है तो पुराने से दिल हटा लेनी है।
वरदान:-
ईश्वरीय कुल
की स्मृति द्वारा माया का सामना करने वाले सदा समर्थ स्वरूप भव
किसी भी कार्य में सफलता
प्राप्त करनी है तो पहले स्मृति द्वारा समर्थी स्वरूप बनो। समर्थी आने से माया का
सामना करना सहज हो जायेगा। जैसी स्मृति होती है वैसा स्वरूप बन जाता है इसलिए सदा
पावरफुल स्मृति रहे - कि जब तक यह ईश्वरीय जन्म है तब तक हर सेकण्ड, हर संकल्प, हर
कार्य ईश्वरीय सेवा पर हूँ। हमारा यह ईश्वरीय कुल है, यह स्मृति की सीट सर्व
कमजोरियों को समाप्त कर देगी।
स्लोगन:-
सत्य
समय प्रमाण स्वयं सिद्ध होता है उसे सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं।
ये अव्यक्त इशारे
- महान बनने के लिए मधुरता और नम्रता का गुण धारण करो
मैजारिटी के सामने
सर्विस में बाधा डालने वाला मुख्य विघ्न आता है - मैंने यह किया, मैं ही यह कर सकता
हूँ... यह मैंपन आना इसको ही कहा जाता है ज्ञान का अभिमान, बुद्धि का अभिमान,
सर्विस का अभिमान, इन रूपों में ही विघ्न आते हैं। इस प्रकार के विघ्नों को समाप्त
करने के लिए सदा एक शब्द याद रखना कि मैं निमित्त हूँ। निमित्त बनने से ही निराकारी,
निरंहकारी और नम्रचित, नि:संकल्प अवस्था में रह सकते हैं, यही धारणायें वायुमण्डल
को निर्विघ्न बना देती हैं।