30-09-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - इस देह-भान से मर जाओ अर्थात् इस पुरानी
पतित देह से प्रीत तोड़ एक बाप से सच्ची प्रीत जोड़ो''
प्रश्नः-
संगम पर तुम
बच्चों की नेचुरल ब्युटी कौन सी है?
उत्तर:-
ज्ञान के जेवरों
से सदा सजे सजाये रहना - यही तुम्हारी नेचुरल ब्युटी है। जो ज्ञान के जेवरों से सजे
हुए रहते हैं उनका चेहरा खुशी में फूल की तरह खिला रहता है। अगर खुशी नहीं रहती तो
जरूर कोई देह-अभिमान की आदत है, जिससे ही सब विकार उत्पन्न होते हैं।
गीत:-
महफिल में जल
उठी शमा.....
धारणा
के लिए मुख्य सार:-
1)
कोई भी गन्दी (छी-छी) आदत नहीं डालनी है। जीते जी देह का भान छोड़ना है। फूल मुआफिक
हर्षित रहना है।
2) पारलौकिक बाप को
फॉलो कर पावन बनना है। उनकी श्रीमत पर चलने की प्रतिज्ञा करनी और करानी है।
वरदान:-
निर्विकारी वा
फरिश्ते स्वरूप की स्थिति का अनुभव करने वाले आत्म-अभिमानी भव
जो बच्चे आत्म-अभिमानी
बनते हैं वह सहज ही निर्विकारी बन जाते हैं। आत्म-अभिमानी स्थिति द्वारा मन्सा में
भी निर्विकारीपन की स्टेज का अनुभव होता है। ऐसे निर्विकारी, जिन्हें किसी भी
प्रकार की इम्प्युरिटी वा 5 तत्वों की आकर्षण आकर्षित नहीं करती - वही फरिश्ता
कहलाते हैं। इसके लिए साकार में रहते हुए अपनी निराकारी आत्म-अभिमानी स्थिति में
स्थित रहो।
स्लोगन:-
जीवन में
अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करने के लिए विशेष अमृतवेले एकान्तप्रिय बनो।
ये अव्यक्त इशारे -
अब अपने दाता स्वरूप को प्रत्यक्ष करो
ब्राह्मण आत्माओं के
पास ज्ञान तो पहले ही है लेकिन उनके प्रति दो प्रकार से दाता बनो:- 1- जिस आत्मा
को, जिस शक्ति की आवश्यकता हो, उस आत्मा को मन्सा द्वारा अर्थात् शुद्ध वृत्ति,
वायब्रेशन्स द्वारा शक्तियों का दान अर्थात् सहयोग दो। 2- कर्म द्वारा सदा स्वयं
जीवन में गुण मूर्त बन, प्रत्यक्ष सेम्पल बन औरों को सहज गुण धारण करने का सहयोग
दो, इसको कहा जाता है गुण दान। दान का अर्थ है सहयोग देना।